मीडिया में दलितों की दयनीय स्थिति- संजय कश्यप

05-01-2018 18:26:46 पब्लिश - एडमिन


मीडिया में दलितों की दयनीय स्थिति - राजनीति का केन्द्रबिन्दु दलित लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ में उपेक्षित

देश और विभिन्न प्रदेशों में राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहने वाला दलित समाज मीडिया में किस कदर उपेक्षित और तिरस्कृत है इसका जीता जागता प्रमाण यह है कि किसी प्रतिष्ठित न्यूज चैनल पर कोई दलित चेहरा नहीं है। इसे विडम्बना कहा जाये या दलित समाज के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित मानसिकता कि कोई दलित किसी चैनल में किसी शो या डिबेट की एंकरिंग करता नजर नहीं आता जबकि आज हर क्षेत्र में शिक्षित दलित युवा अपनी प्रतिभा को प्रमाणित कर रहे हैं। एक दलित उप प्रधानमंत्री पद सहित रक्षामंत्री पद को सुशोभित कर सकता हैं। देश के प्रथम नागरिक होने का गौरव प्राप्त कर चुका है। केन्द्र व विभिन्न राज्यों के मंत्रिमंडल में मौजूद है। देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में चार बार मुख्यमंत्री रह सकता है किन्तु किसी न्यूज चैनल का एंकर नहीं बन सकता।

लगभग तमाम चैनलों पर दलित उत्थान, राजनीति व सामाजिक और औद्योगिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी को लेकर डिबेट होती है। खुद को दलित चिन्तक और हितैषी के रूप में प्रचारित करने वाले विभिन्न चेहरे दलित सरोकारों पर बहुत कुछ कहते नजर आते हैं। देश की समस्त राजनीतिक पार्टियां अपनी राजनीति के केन्द्र में दलितों को रखते हैं किन्तु निजी क्षेत्र का मीडिया दलित एंकर रखने से परहेज करता है तो इसका सीधा सा मतलब यही है कि इलैक्ट्रोनिक मीडिया अभी भी स्वतंत्रता पूर्व प्रचलित परम्पराओं से ग्रस्त है जब किसी दलित बालक को स्कूल परिसर में रखे पानी के मटके से स्वयं पानी लेकर पीने की आजादीनहीं थी। क्लास में सबसे अलग बिठाया जाता था। उसे अच्छे कपड़े पहनने की अनुमति नहीं थी। मीडिया जगत से सम्बन्धित एक रोचक प्रसंग है कि जब दलितों के मसीहा डा. भीमराव अम्बेडकर ने दलितों की आवाज उठाने के लिए ‘‘मूकनायक’’ पत्रिका प्रकाशित करने का इरादा किया तो उन्होंने उस समय के प्रतिष्ठित समाचार पत्र में विज्ञापन प्रकाशित कराने के लिए भेजा। उस पत्र के स्वामी/प्रकाशक/सम्पादक उच्च कुलीन वर्ग के थे, ने मूकनायक का विज्ञापन प्रकाशित करने से इन्कार कर दिया था। इस प्रकरण को बाबा साहेब ने अपनी पुस्तक में लिखा है। डा. भीमराव अम्बेडकर की पुस्तक ‘‘गांधी और कांग्रेस ने दलितों के लिए क्या किया?’ में तत्कालीन मीडिया जगत में कार्यरत लोगों को जातिवार जिक्र किया जिसमें महज तीन फीसदी आबादी के बावजूद ब्राह्मण सर्वाधिक उच्च पदों पर तैनात थे। आज भले ही हालात बदल गये हो लेकिन दलित मीडिया में आज भी उपेक्षित है। ऐसा क्यों है इस पर कभी किसी दलित चिन्तक या मसीहा ने नहीं सोचा और न आवाज बुलन्द की।

आज विभिन्न दलित संगठन जो खुद को डा. भीमराव अम्बेडकर का अनुयायी कहते हुए सरकारी और गैर सरकारी तथा निजी क्षेत्र में भी आरक्षण की मांग करते दिखते हैं उनके मंच से भी कभी किसी दलित हितैषी नेता ने मीडिया में दलितों की उपेक्षित स्थिति पर दो शब्द तक नहीं कहे। मीडिया में दलितो की नगण्य भूमिका से तो ऐसा लगता है कि मीडिया क्षेत्र आजादी के सात दशक व्यतीत होने के बाद भी उसी मानसिकता से ग्रस्त है जब दलितों को बराबरी का दर्जा देने के बारे में कोई सोच ही नहीं सकता था। चुनावी सीजन में सभी दलों के नेता कसर कस कर मैदान में आ जाते हैं और खुद को सबसे बड़ा दलित हितैषी साबित करने पर तुल जाते हैं। वोट लेने के लिए खुद को डा. भीमराव अम्बेडकर का सबसे बड़ा और समर्पित बताते हैं, दलितों के हितों में कल्याणकारी योजनाओं और कार्यक्रमों की घोषणा करते हैं किन्तु स्थिति जस की तस है। मगर यह सब चुनावी बाते हैं जिनके पूरे होना न होना वादे करने वाले के विवेक पर निर्भर करता है।

21 वी सदी के बारे में अक्सर सुनने को मिलता है कि यह सदी योग्य और प्रतिभाशाली लोगों की है जिसमें योग्यता और प्रतिभा होगीवह अपना स्थान स्वयं बना लेगा किन्तु भारतीय मीडिया इससे क्षेत्र है। मीडिया में दलितों की भागीदारी न होने से दो कारण हो सकते हैं। पहला तो यह कि देश का युवा दलित मीडिया में कैरियर नहीं बनाना चाहता या फिर यह कि उसे जानबूझ कर अनदेखा किया जा रहा है।कारण जो भी हो लेकिन मीडिया में दलितों की उपेक्षा कुछ सवाल छोड़ती है जिनका जवाब खुद को दलित हितैषी और चिन्तक कहे जाने वाले लोगों को तलाश करना होगा। क्या अजब संयोग है कि प्रधानमंत्री कारोबार और औद्योगिक क्षेत्र में दलितों की भागीदारी बढ़ाने को दलित व्यापारियों व उद्योगपतियों के साथ बैठक करते हैं लेकिन मीडिया जगत इस बारे में सोचता तक नहीं। अमेरिका में अश्वेत हर क्षेत्र में है, ब्रिटेन भी गोर काले की मानसिकता त्याग चुका है। श्वेत अश्वेत संघर्षों को लेकर बदनाम रहे देशों की परिस्थितियां भी बदल चुकी है। अश्वेतों की भागीदारी बढ़ रही है लेकिन वसुधैव कुटुम्बकुम का संदेश देने वाले भारतीय समाज में 20-22 करोड़ की विशाल आबादी वाला वर्ग लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ कहे जाने वाले मीडिया में जगह पाने से महरूम है। इस दयनीय स्थिति के लिए दलित स्वयं दोषी है या व्यवस्था यह देखना होगा। वास्तव में यह बेहद दुखद है लोकतंत्र के सबसे महत्वपूर्ण स्तम्भों में शामिल विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका में भागीदारी के बावजूद दलित लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का अंग नहीं बन सका।

जाने माने वरिष्ठ पत्रकार दिलीप सी मंडल ने अपनी एफबी वॉल पर इस ओर इशारा करते हुए लिखा है किः-‘‘ बीस करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले दलित समाज से नेशनल न्यूज चैनलों में दलित एंकर देखने के लिए कितना इंतजार करना होगा? दिलीप सी मंडल लिखते हैं कि राष्ट्रपति से लेकर सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस और ज्ञान के तमाम क्षेत्रों में झंडे गाड़ने वाला समाज मीडिया के सामने जाकर लंगड़ा क्यों हो जाता है! मंडल लिखते हैं कि दलितों में सब कुछ है लेकिन फिर भी उसके लिए जगह नहीं है तो क्यों? समस्या कहां है? मंडल लिखते हैं कि अमेरिकी चैनलों पर कई टाप ब्लैक एंकर हैं तो भारत में क्या रंगभेद से भी बड़ी कोई समस्या है? कहीं यह एक्सक्लूसन यानि जानबूझकर दलितों को बाहर रखने का मामला तो नहीं? इन चैनलों की प्रगतिशीलता की हद यह है कि वे दलितों के बारे में बात तो कर लेंगे लेकिन किसी दलित को मौका नहीं देंगे।

अन्त में मंडल विचलित होकर लिखते हैं किः-‘‘अगर यह बात आपको परेशान नहीं करती तो आप....अब मैं क्या कहूं? आप वही हैं’’

( आक्रोश के सम्पादक संजय कश्यप की एफबी वॉल से )

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