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पत्रकार गौरी लंकेश सजा याफ्ता थी

गौरी लंकेश सजा याफ्ता थी, पत्रकारिता नहीं बल्कि कम्युनिस्ट सोच की जेहादी थी
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हत्या किसी की भी हो वह निदंनीय होनी चाहिए पर कुछ हत्याएं ऐसी होती हैं जो स्वयं परिस्थितियां निर्मित करती है। गौरी लंकेश की हत्या भी निदंनीय है पर देखना यह चाहिए कि उसकी हत्या पर हायतौबा मचाने वाली कम्युनिस्ट जमात क्या सही में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के आकंाक्षी रहे हैं? सही तो यह है कि ये तो हिंसक और तानाशाही प्रवृति के वाहक है। कम्युनिस्टों ने तानाशाही प्रवृति के कारण दुनिया भर में करोडो लोकतांत्रिक वादियों को मार डाला है। अभी-अभी चीन ने उस लोकतांत्रिक सेनानी को जेलों में सडा कर मार डाला जिसे शांति और सदभाव के लिए नोबल पुरस्कार मिला था?
--------- कौन थी गौरी लंकेश............. गौरी लंकेश कर्नाटक में एक तथाकथित पत्रकार थी, लंकेश मीडिया घराने की मालकिन थी और कम्युनिस्ट विचारों की प्रवक्ता थी। अपनी मैगजीन में वह कम्युनिस्ट विचारों के लिए सक्रिय रहती थी। हिन्दू धर्म के खिलाफ वह जेहाद करती थी पर मुस्लिम और ईसाई प्रसंग वाले प्रश्नों पर उसकी कोई सक्रियता नहीं होती थी।
-------सजायाफ्ता थी वह ............... गौरी लंकेश सजा याफ्ता थी। उसने भाजपा के सांसद प्रहलाद जोशी के खिलाफ अस्वीकार और वैचारिक रक्तरंजित खबरें प्रकाशित की थी। इसके खिलाफ प्रहलाद जोशी कोर्ट गये थे। कोर्ट ने झूठी और छवि खराब करने वाली खबर छापने के लिए सजा सुनायी थी। अभी वह जमानत पर थी। सजा होने का अर्थ है कि वह आपराधिन भी थी।
------  कम्युनिस्टों का हायतौबा.......... कम्युनिस्ट जमात ने न केवल दिल्ली में बल्कि पूरे देश में हायतौबा मचा रखा है। गौरी लंकेश की हत्या को हिन्दू फास्टिवाद से जोडा जा रहा है। कम्युनिस्टों का शोर यह बता रहा है कि गौरी लंकेश कम्युनिस्ट सोच की थी और उसकी सक्रियता कम्युनिस्ट विचारों के प्रति थी।
------गौरी लंकेश के अन्य कार्य......... कहा जाता है कि गौरी लंकेश पत्रकारिता की आड में कई प्रकार के जंजाल से उलझी हुई थी। कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार से उसके रिश्ते भी अच्छे थे। जब किसी सरकार से रिश्ते अच्छे होते हैं तो उसके भुनाने में पत्रकार के खेाल में बैठा व्यक्ति कई प्रकार के अस्वीकार्य कार्य भी करता है। इसलिए दुश्मन भी हजार होते हैं।
------सबक क्या है........... गौरी लंकेश की हत्या का सबक यह है कि एक पत्रकार को पत्रकार ही रहना चाहिए। एक पत्रकार को किसी भी राजनीतिक दल के सदस्य या प्रवक्ता के तौर पर काम नहीं करना चाहिए। जब आप किसी राजनीतिक दल के सदस्य के तौर पर कार्य करते हैं तब आपकी पत्रकारिता अविश्वनीय हो जाती है। उसका परियणाम भी घातक होता है, जैसा कि गौरी लंकेश के साथ हुआ है।

(विष्णु गुप्त जी की एफबी वॉल से) 

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