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मध्यप्रदेश

आक्रोश४मीडिया की खबर का असर, हटाये गये नशेबाज थानेदार, पत्रकार से की थी बदसलुकी

आक्रोश४मीडिया पर प्रकाशित की खबर के बाद पत्रकारों की एक जुटता रंग लाई जिसके बाद नशे बाज थानेदार को तत्कालीन पुलिस अधीक्षक ने थाना इंचार्ज को हटाकर जिला मुख्यालय में भेज दिया है आपको बता दे की बीते दो दिनों पहले मध्यप्रदेश के जिला जोबट के संवाददाता आकाश उपाध्याय के साथ इस थानेदार ने छोटी सी बात को लेकर बदसलुकी कर दी थी जिसके बाद आक्रोश ने इस खबर को प्रमुखता से www.aakrosh4media.com पर छापा था आपको बता दे इस खबर को छापने के बाद और पत्रकारों के भारी विरोध के कारण नशेबाज थानेदार माननीय् पुलिस अधीक्षक ने तत्काल प्रभाव से हटाते हुए जिला मुख्यालय बुला लिया है  इस घटना के बाद उपरोक्त मामले में पत्रकारों में काफी रोष फैल रहा था ! अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा परिषद के प्रदेश महा सचिव आकाश उपाध्याय के साथ हुई बदसलुकी से आक्रोशित स्थानीय पत्रकारों तथा परिषद के प्रान्तिय अध्यक्ष श्री खालिद कैस ने पुलिस अधीक्षक श्री कार्तीकेयन से चर्चा कर विरोध दर्ज कराया था जिस पर पुलिस अधीक्षक ने उक्त कार्यवाही की! इस कार्यवाही को पत्रकार एकता की जीत के रूप मे देखा जा रहा है ।
दिनेश उपाध्याय (जिला जोबट मध्यप्रदेश )
 
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भाजपा विधायक ने किया पत्रकार पर हमला पुलिस बनी मोन

भाजपा विधायक ने किया पत्रकार पर हमला ....." पुलिस प्रशासन देखता रहा "
लगता है की उत्तर प्रदेश भाजपा को मोदी जी एवं योगी जी के कारण मिला विशाल बहुमत हजम नहीं हो रहा है ! यही कारण है कि विधायकों तथा कार्यकर्ताओ के लोक दुर्व्यवहार की खबरें निरंतर आ रही हैं ? बिते दिनो एक विधायक के द्वारा उत्तर प्रदेश में लेडी सिंघम कहीं जाने वाली महिला पुलिस अधिकारी को सार्वजनीक रुप से प्रताड़ित करने का मामला सामने आया था और न्युज चेनल पर उक्त महिला अधिकारी की छलछलाती आंखे सबने देखी थी ! आगे पढ़े......... 
अब एक ताजा मामला फिर सामने आया है जिसमें बलराम पुर क्षेत्र के एक विधायक के द्वारा राष्ट्रीय स्वरुप समाचार पत्र के ब्युरो चीफ राकेश सिंह पर हमले की खबर है! प्राप्त जानकारी के अनुसार   पत्रकार राकेश सिंह समाचार संकलन हेतु एडीएम कार्यलय गये थे, तभी वहां गैसडी क्षेत्र के विधायक आ गये राकेश सिंह ने समाचार संकलन हेतु विधायक का फोटो ले लिया, इस पर विधायक ने अश्लील शब्दों का उपयोग करते हुए पत्रकार पर हमला कर दिया! इतना ही नहीं सत्ता के नशे में बदमस्त विधायक ने बुरी तरह से घायल हो चुके पत्रकार को झुटे मुकदमों में फसाने की धमकी देते हुए अपने पवार का बेजा उपयोग किया! आश्चर्य इस बात का है की सत्ता के दबाव या प्रभाव में वहां उपस्थित पुलिस के आला अफसर भी मुक दर्शक बने रहे! यहाँ सवाल यह है की जिस जंगल राज को खत्म करने की बात कह कर भाजपा सत्ता में आई थी क्या वह खत्म हो गया? ऐसा लगता तो नहीं है क्यो की अगर पत्रकार ही सुरक्षित नहीं हैं तो आम जनता का क्या हो रहा होगा ...? एक और तो प्रधान मंत्री जी एवं योगी जी अपने आप को देश व जनता का सेवक बता रहे हैं वही उनके विधायक सत्ता के नशे में बदमस्त हो कर लोकतंत्र के चौथे स्तंभ को चोट पहुँचा रहे हैं जो निंदनीय है! 
(मध्यप्रदेश के जोबट से दिनेश उपाध्याय के द्धारा आक्रोश को भेजी गई खबर के आधार पर)

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भोपाल के सांध्य दैनिक अखबार से भोपाल नगर निगम नही वसूल पाया टैक्स का लाखो रुपया

भोपाल के एक सांध्य दैनिक अखबार प्रदेश टुडे पर कई सालो से नगर निगम का लाखों रुपयो का टैक्स बकाया चला आ रहा है भोपाल नगर निगम के सख्ती से पेश आने वाले अधिकारी भी लाचार है कई बार अख़बार के मालिक को प्रोपर्टी टैक्स का नोटिस भेजने के बाद भी टैक्स वसूला नही जा सका क्योंकि सांध्य दैनिक अखबार का मालिक मध्यप्रदेश में अपना अच्छा रुतबा रखता है 

भोपाल नगर निगम के कमिश्नर ने बड़े बड़े लोगो से टैक्स वसूलने के निर्देश जारी किये हुए है और इन्ही अखबारों में सांध्य दैनिक अखबार प्रदेश टुडे का नाम भी है इस सांध्य दैनिक अखबार प्रदेश टुडे के मालिक के द्धारा कई बड़े शहरो में संचालित कंपनी व् अखबारों के दफ्तरों में छापे पड़े है 

बड़े अखबारों के मालिकों ने नहीं माना सुप्रीमकोर्ट का आदेश

मध्य प्रदेश के इंदौर में एक भी बड़े अखबार मालिको ने नहीं माना सुप्रीमकोर्ट का आदेश

मजीठिया वेज बोर्ड मामले में माननीय सुप्रीमकोर्ट ने साफ़ आदेश दिया था कि मजीठिया वेज बोर्ड की रिपोर्ट को 11 नवम्बर 2011 से माना जाएगा और कर्मचारियों को उनका एरियर मार्च 2014 तक जरूर दे दिया जाए लेकिन इंदौर में दैनिक भास्कर ,राजस्थान पत्रिका और स्वदेश ने बाकायदे मार्च 2014 के बाद श्रम आयुक्त कार्यालय को एक पत्र लिखा और इस रिपोर्ट को लागू करना इसलिए जरुरी नहीं बताया क्योकि उन्होंने 20 (जे)का सहारा लिया है ।स्वदेश ने तो दो दो बार श्रम आयुक्त कार्यालय को पत्र लिखकर कागजात देने में समय माँगा।
मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर अपने ही पत्रकारों और गैर पत्रकारों के पेट पर लात मारने वालों में मध्यप्रदेश के अखबार मालिक भी कम नहीं हैं।यहाँ मध्यप्रदेश के इंदौर सहित कई जगहों पर अब तक श्रम आयुक्त कार्यालयों द्वारा अखबार मालिको के कार्यालय में जाकर सर्वे नहीं किया गया।ऐसा आरोप भी लग रहा है ।मध्यप्रदेश के एक साथी ने आर टी आई के जरिये ये जानकारी निकाली कि किस समाचार पत्र प्रतिष्ठान ने मजीठिया वेज बोर्ड मामले में अपना क्या स्टेटमेंट दिया है और तय समय पर अखबार मालिको ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिस लागू की या नहीं ।इस आर टी आई के जरिये श्रम आयुक्त कार्यालय ने वर्ष 2014 और 15 में समाचार पत्र मालिकों द्वारा भेजे गए पत्र की कॉपी की प्रति भी भेजी है।
इस सुचना में बताया गया है कि फ्री प्रेस ने इंदौर के सहायक कामगार आयुक्त को 24 जून 2015 को एक पत्र लिखकर बताया है कि उसने कुल 51 कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ दिया है जिसमे 15 पत्रकार और 36 गैर पत्रकार हैं।
फ्री प्रेस की तरफ से डायरेक्टर इन चार्ज प्रवीण नागर ने ये जवाब सहायक कामगार आयुक्त को भेजा है।इसी तरह दैनिक भास्कर ने श्रम आयुक्त इंदौर को एक पत्र लिखकर 6 जुलाई 2015 को बताया कि उसके यहाँ कर्मचारियों ने 20 (जे)का विकल्प स्वेच्छा से चुना है ।दैनिक भास्कर ने श्रम आयुक्त कार्यालय द्वारा भेजी गयी एक नोटिस के जवाब में ये जानकारी दी।डी बी कार्प की तरफ से भेजे जवाब में लिखा गया है 11 नवम्बर 2011 को मजीठिया वेज बोर्ड के लिए जारी अधिसूचना में सेक्शन 20 (जे) जो अधिसूचना के पेज नंबर 75 ,76 में है का विकल्प हमारे कर्मचारियों ने चुना है इसलिए मजीठिया वेज बोर्ड की अधिसूचना डी बी कार्प में लागू नहीं होती ।दैनिक भास्कर की तरफ से इसके पूर्व सहायक श्रम आयुक्त को 28 जुलाई को लिखे एक पत्र में कहा गया है कि आपके 25 मई 2014 के पत्र के जवाब में आपको सूचित करना चाहूँगा कि 11 नवम्बर 2011 को जारी अधिसूचना में 20 (जे)का विकल्प हमारे कर्मचारियों ने स्वेच्छा से चुना है।कर्मचारियों द्वारा 20 (जे )की साइन की गए पत्र की प्रति भी डी बी कोर्प ने इंदौर के सहायक कामगार आयुक्त को भेज दिया जबकि 20 (जे)में कहा गया है कि अगर कर्मचारी का वेतन पहले से ज्यादा है तो उसके वेतन को किसी तरह कम नहीं किया जा सकता।यानि अगर मजीठिया वेज बोर्ड् से ज्यादा हो तो।मध्यप्रदेश मेसमाचार पत्र मालिको ने 20 (जे)का खूब दुरूपयोग किया।
दैनिक भास्कर का इस आर टी आई से एक और बात सामने आई है।भास्कर की प्रबंधन कंपनी ने इस एक पत्र के जरिये पुरे मध्यप्रदेश में कार्यरत अपने पत्रकारो और गैर पत्रकारों की एक सूचि भी श्रम आयुक्त कार्यालय को भेजी है जिसमे इंदौर में 78 पत्रकार और गैर पत्रकारों की संख्या 307 बताया है।इसी तरह खंडवा में पत्रकार 38 और गैर पत्रकार 63 बताये गए हैं।रतलाम में 32 पत्रकार और 56 गैर पत्रकार हैं।सागर में 36 पत्रकार और 74 गैर पत्रकार हैं।उज्जैन में 27 पत्रकार और 68 गैर पत्रकार है।दैनिक भास्कर में मध्य प्रदेश में कुल पत्रकारो की संख्या जोड़े तो 372 है और गैर पत्रकारो की संख्या 912 है ।भास्कर में कुल 1284 कर्मचारी पत्रकार और गैर पत्रकार की कटेगरी में हैं।
यहॉ राजस्थान पत्रिका ने भी इंदौर में 7 जुलाई 2015 को सहायक श्रम आयुक्त को एक पत्र लिखकर
मजीठिया वेज बोर्ड न देने के बहाने खोज लिए हैं।राजस्थान पत्रिका ने इस पत्र में लिखा है कि संस्थान द्वारा कर्मचारियों को मजीठिया वेज बोर्ड की वेतन अनुपालना की जारही है।राजस्थान पत्रिका ने भी 20 (जे)को ढाल बनाया है और लिखा है इस पत्र में कि एनी कर्मचारियों द्वारा उन्हें मिल रहे वेतन लाभ से संतुस्ट होकर स्वेच्छा से उक्त वेज बोर्ड की सिफारिशों के बिंदु संख्या 20 (जे) में प्रदान किये विकल्प को चुनते हुए वर्तमान में दिए जा रहे वेतन पर अपनी सहमति प्रदान की है।साथ ही पत्रिका ने ये भी लिखा है कि हमारे सभी दस्तावेज जयपुर मुख्यालय में रहते हैं।
इसी तरह स्वदेश समाचार पत्र के प्रबंधक ने भी 8 जुलाई 2015 को एक पत्र इंदौर के सहायक श्रम आयुक्त को एक पत्र लिखकर मजीठिया वेज बोर्ड से जुड़े कागजात देने में एक माह का समय माँगा था और लिखा था 2011 से कागजातों को एकत्र करने में उसे एक माह का समय दिया जाय।
स्वदेश को सहायक श्रम आयुक्त इंदौर ने एक नोटिश भी दिया था।कारण बताओ नोटिस के जवाब में स्वदेश ने 15 जुलाई 2015 को भेजे पत्र में लिखा है कि आपके द्वारा चाही गयी जानकारी काफी पुरानी है इसलिए उसे एकत्र करने के लिए एक माह का समय आवश्यक है। यानी मध्यप्रदेश के बड़े अखबारो में एक ने भी मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिस तय समय पर लागू करने के आदेश को नहीं माना ।और माननीय सुप्रीमकोर्ट के आदेश को जमकर हवा में उछाला।

मध्य प्रदेश में परिवार की भयंकर आर्थिक तंगी से दुखी वरिष्ठ पत्रकार की बेटी ने आत्महत्या की

भोपाल के पत्रकार शिवराज सिंह की प्रतिभावान बेटी ने पिता की आर्थिक तंगी से परेशान होकर खुदकुशी कर ली। वह आठवीं की छात्रा थी। पत्रकार शिवराज सिंह भोपाल के कई अखबारों में काम कर चुके हैं। कुछ दिन पहले प्रबंधन की मनमानी के चलते उन्हे भोपाल के एक प्रमुख दैनिक समाचार पत्र से नौकरी से निकाल दिया गया था। इसके बाद से वे भयंकर आर्थिक तंगी से गुजर रहे थे। स्कूल की टॉपर उनकी बेटी पिता की इस तंग हालत से परेशान थी। वो पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी, इसलिए उसने जान दे दी।

इंडियन प्रेस फोरम के अध्यक्ष महेश दीक्षित ने इस झकझोर देने वाली दुखद घटना पर शोक जताया तथा कहा कि इसके लिए पूर्णत: शोषक मीडिया समूह और सरकार की लापरवाही दोषी है। उन्होंने पत्रकार शिवराज को समुचित आर्थिक सहायता देने की राज्य सरकार से मांग की तथा पत्रकार साथियों से दुख की इस घड़ी में शिवराज के साथ खड़े होने का आग्रह किया। श्री दीक्षित ने कहा कि सैकड़ों काबिल पत्रकार आर्थिक तंगी के दौर से गुजर रहे हैं और उनके बच्चे इसका खामियाजा भुगत रहे हैं। वजह मीडिया मालिक उन्हें काम का पूरा वेतन न देकर उनका शोषण कर रहे हैं। आज प्रदेश के कई मीडिया समूह पत्रकारों को कई-कई महीने से वेतन नहीं दे रहे हैं।

यदि पत्रकार कर्मी वेतन मांगने जाता है तो उसे मैनेजमेंट द्वारा अपमानित किया जाता है या फिर उसे नौकरी से निकाल दिया जाता है। जबकि मीडिया समूह खुद सरकार से समस्त सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं। दबाव बनाकर हर महीने लाखों के विज्ञापन ऐंठ रहे हैं। मीडियाकर्मियों के लिए बनाए गए मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद सरकार लागू नहीं करा पा रही है। अखबारों के दफ्तरों में मजीठिया वेजेज को लागू कराने और पत्रकारों को वेजेज के अनुसार वेतन मिल रहा है या नहीं इसकी निगरानी करने की जिम्मेदारी सरकार के श्रम विभाग की है। लेकिन लगता है श्रम विभाग ने इन निरंकुश हो चुके मीडिया समूहों के सामने घुटने टेक दिए हैं। पत्रकार शिवराज की प्रतिभावान बेटी की आर्थिक तंगी में खुदकुशी, सरकार की लापरवाही और मीडिया समूहों की शोषण नीति का नतीजा है।

दीक्षित ने कहा कि फिर कोई पत्रकार की बेटी खुदकुशी न करे, इसके लिए सरकार को चाहिए कि, वह ऐसे मीडिया समूहों पर कार्रवाई करे, जो मजीठिया वेजेज का लाभ अपने यहां काम करने वाले पत्रकार कर्मियों को नहीं दे रहे हैं। जब तक मीडिया समूह अपने यहां कार्यरत पत्रकार कर्मियों को मजीठिया वेतनमान नहीं दे देते हैं, तब तक इन मीडिया समूहों को दी जाने वाली समुचित सरकारी सुविधाएं तथा सरकारी विज्ञापन बंद कर देना चाहिए

Dipesh