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माणिक की सादगी को तवज्जो नहीं देता राष्ट्रीय मीडिया

21-02-2018 17:40:19 पब्लिश - एडमिन


 

त्रिपुरा। राजस्थान में हुए उपचुनाव की खबरों को प्रमुख स्थान देने वाले प्रमुख समाचार पत्रों के साथ क्षेत्रीय समाचार पत्रों से पूर्वोत्तर के तीन राज्यों के विधानसभा चुनावों को पर्याप्त तवज्जो न दिये जाने से बरबस ही एक सवाल उठता है कि क्या मीडिया खासकर हिन्दी भाषाई मीडिया निष्प़क्षता के मानदंडों को तिलाजंलि दे चुका है। खबरिया चैनल टीआरपी के मोह में पूर्वोत्तर की खबरों को भले ही जगह न दे लेकिन हिन्दी अखबारांे से ऐसी उपेक्षा अखरती है। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की सादगी को लेकर प्रमुख अंग्रेजी दैनिक विस्तार से छापता है लेकिन हिन्दी अखबारों में माणिक सरकार की सादगी की खबर को जगह नहीं जो कि बतौर मुख्यमंत्री चैथा कार्यकाल पूरा कर रहे हैं। गुजरात में भाजपा की लगातार जीत को प्रमुखता से प्रकाशित करने वाले अखबारों ने माणिक की उपलब्धियां नजर अन्दाज कर दी जाती है। राष्ट्रीय मीडिया में अमित शाह और कैबिनेट मंत्री नितिन गडकरी के बच्चों की मंहगी शादियों की खबरों को भी जगह मिलती है लेकिन सरकारी सेवा से निवृत्त पत्नी की पेंशन पर जिन्दगी गुजाने वाले माणिक सरकार की सादगी को तवज्जो नहीं मिलती तो हिन्दी मीडिया की निष्पक्षता पर प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक है। माणिक देश के ऐसे पहले मुख्यमंत्री हैं जिनके पास न कार है और न निजी आवास। वह माकपा के 1968 से सदस्य है और राज्य में अपनी सादगी को लेकर खासे लोकप्रिय हैं, बावजूद इसके वह राष्ट्रीय मीडिया में जननायक नहीं है।

चुनाव जीतने के मकसद से भाजपा समर्थक ने ‘‘लाल सरकार’’ नामक फिल्म बनाई जिसे चुनाव से पहज एक दिन पूर्व प्रदर्शित किया गया जिसमें मुख्यमंत्री और उनकी सरकार की गलत छवि पेश किये जाने की चर्चा है। त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में भारी संख्या में संघ कार्यकर्ताओं को भेजे को भेजे जाने से लेकर वरिष्ठ नेताओं के कैम्प करना की खबर को छिपा ली गयी जबकि भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के चुनावी भाषणों को प्रमुखता से छापा गया। त्रिपुरा में चुनाव जीतने के लिए भाजपा ने अपना चिर परिचित अन्दाज मंे साम्प्रदायिक रंग देने में भी परहेज नहीं किया।  पीएम ने अपने भाषण में कहा कि बांग्लादेशियों की घुसपैठ से त्रिपुरा के अस्तित्व को खतरा पैदा हो गया। यहां तक कहा गया कि केन्द्र में भाजपा की सरकार पदारूढ़ होने के बाद पाकिस्तान थर्राने लगा है। इसके अलावा पीएम के त्रिपुरा में रबर की खेती करने की बात को प्रचारित किया गया। भाजपा के राज्य के अलगाववादी संगठन के रूप में पहचान रखने वाले ‘‘इंडिजेन्स पीपुल्स फ्रंट आफॅ त्रिपुरा (आईपीएफटी) से औपचारिक गठबंघन का जिक्र भी मीडिया की मुख्य धारा से नदारद है। प्रख्यात वैज्ञानिक गौहर रजा को अलगाववादियों का समर्थक और गैर भाजपाई नेताओं की देशभक्ति पर सवाल उठाने वाले मीडिया ने एक अलगाववादी संगठन से भाजपा के चुनावी तालमेल पर कोई डिबेट आयोजित नहीं की। यह अपने आप में विचारणीय प्रश्न है।

जहां तक त्रिपुरा के सीएम माणिक सरकार की बात है तो वह ऐसे पहले मुख्यमंत्री है जो सरकारी सेवा से रिटायर्ड हुई पांचाली भटटाचाय्र की पेंशन और माकपा पोलित ब्यूरो के सदस्य और पूर्णकालिक कार्यकर्ता मिलने वाली सीमित धनराशि पर ही गुजारा कर रहे हैं। मुख्यमंत्री के रूप में मिलने वाले वेतन और अन्य सुख सुविधाओं पर होने वाले खर्च को वह पार्टी फंड में दान कर देते हैं।

 

 

 

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