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न्यूज प्रिंट महंगा होने से छोटे अखबारों का वजूद खतरे में

15-03-2018 16:18:14 पब्लिश - एडमिन


नई दिल्ली। भारतीय मीडिया की रीढ़ कही जाने वाले लघु एवं मध्यम वर्ग के समाचार पत्रों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है। इसकी वजह न्यूज प्रिंट के दामों में आई भारी उछाल है। न्यूज प्रिंट के दामों में 40 प्रतिशत बढ़ोतरी हुई है। न्यूज प्रिंट 37,000 रूपये टन से बढ़कर 52 हजार रूप्ये टन पहुंच गया है। न्यूज प्रिंट की कीमतों मंे गगनचुम्बी उछाल आने से लघु एवं मध्यमवर्गीय अखबारों के वजूद पर खतरा मंडराने लगा है। न्यूज प्रिंट में उछाल का यह सिलसिला पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुआ था जो जारी है। वर्ष 2017 के शुरू में न्यूज प्रिंट 33,500 रुपये प्रति टन था जो अब 52,000 प्रति टन पहुंच गया है। इस कीमत में डिलीवरी खर्च जोड़ देने से 36 से 37 हजार हो जाता था लेकिन अब स्थिति बदल चुकी है। न्यूज प्रिंट प्राइस में डिलीवरी खर्च जोडन से कीमत बेहद ज्यादा हो गई है। इस स्थिति को लघु एंव मध्यम वर्ग के अखबारों के लिए खतरे का संकेत माना जा रहा है। दूसरे शब्दों में यह कहना ज्यादा मुनासिब होगी कि इनके वजूद पर ही खतरा मंडराने लगा है।

भारत में न्यूज प्रिंट के आयात में कमी की वजह चीन है जो अमेरिका और यूरोपीय कम्पनियों को अधिक कीमत अदा कर रहा है। यूरो महंगा होता जा रहा है जिसे यूरोपीय कम्पनियांे का लाभ घट गया है। वह ज्यादा कीमत मांग रही है। दूसरी ओर वैश्विक जगत में न्यूज प्रिंट उत्पादन और मांग में गिरावट का सिलसिला चल रहा है। इसके चलते अमेरिका में न्यूज प्रिंट बनाने वाली कई कम्पनियों पर ताला लग चुके हैं। इसके साथ ही जिन कम्पनियों में उत्पादन हो रहा है वहां भी कमी दर्ज की जा रही है। आंकडे बताते हैं कि भारत में न्यूज प्रिंट का आयात में वृद्धि हुई है। वर्ष 2013 में जो आयात 12.39 लाख टन था वह 2016 में उछल कर 14.33 लाख टन पहुंच गया। देश मंे तकरीबन प्रति वर्ष 28 लाख टन न्यूज प्रिंट की जरूरत है लेकिन घरेलू उत्पादन 13-14 लाख टन तक सीमित है जिसके चलते बाकी मांग पूरी करने के लिए 13-14 लाख टन न्यूज प्रिंट का आयात करना पड़ता है। यही नहीं उत्पादन के साथ साथ मांग भी घटती जा रही है। साल 2016 में उत्पादन मांग के अनुरूप कम रहा। 


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