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पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर दबंग दुनिया ने उठाये सवाल

24-02-2018 17:46:11 पब्लिश - एडमिन



मुम्बई। राजनीतिक, कूटनीतिक और रणनीतिक तथा देश विदेश की प्रमुख घटनाओं को पहले पेज की लीड बनाने की परम्परा से हटकर ‘दबंग दुनिया’’ अखबार ने इस बार पत्रकारों की सुरक्षा पर सवाल खड़े करते हुए पहले पन्ने पर ‘‘ हमलवरों के साये में कलम के सिपाही शीर्षक से मेन लीड बनायी है। इस मेन लीड में गौरी लंकेश, नरेन्द्र डाभोलकर, गोविन्द पानसेरे की हत्याओं के साथ साथ अन्य घटनाओं का जिक्र करने के साथ साथ मुम्बई लोकल ट्रेन में मशहूर जर्नलिस्ट सुधीर शुक्ला पर हुए हमले को भी जगह देते हुए राजनीतिक व्यवस्था पर तंज कसा गया है।
दबंग दुनिया अखबार ने बेबाकी से लिखा है कि हमलावरों पर कार्रवाई को लेकर राजनीतिक दल या तो चुप्पी साध लेते हैं अथवा किनारा करते नजर आते हैं। अखबार ने सुरक्षा के मामलों में डाक्टरों की हालत पत्रकारों से बेहतर बतायी है। अखबार ने लिखा कि डाक्टरों की सुरक्षा को मार्ड जैसा संगठन है जिसके माध्यम से सरकार पर दबाव बनाया जा सकता है लेकिन पत्रकार संगठनों में ऐसी कोई एकजुटता नहीं है। अखबार मजीठिया वेज बोर्ड के मुददे पर पत्रकारों को निकाले जाने के मुददे को उठाते हुए लिखता है कि पत्रकारों को त्यागपत्र के लिए विवश किया जा रहा है। सम्पादकों को मार्केटिंग प्रतिनिधि बनाकर उसे प्रतिमाह लाखों का टारगेट पूरा करने का अल्टीमेटम दिया जाने लगा है। टारगेट पूरा न होने पर उसे बाहर कर दिया जाता है लेकिन कोई आवाज बुलन्द नहीं करता। अखबार ने ग्रामीण इलाकों में काम करने वाले पत्रकारों की समस्या को फोकस करते हुए लिखा है कि उन बेचारों को यह तक नहीं पता कि उनका पीएफ होता है या नहीं। अखबार सवाल उठाता है कि ऐसे में वरिष्ठ पत्रकारों को पेंशन की सुविधा प्रदान किये जाने की मांग कैसे की जा सकती है। मेहनती पत्रकारों के बारे में दबंग दुनिया अखबार का मानना है कि उनकी कोई पूछ नहीं है।
अखबार ने तमाम पत्रकार संगठनों की सार्थकता और उपयोगिता पर भी कटाक्ष किये हैं। अखबार लिखता है कि सरकार पर दबाव बनाने में पत्रकार संगठन  नाकाम साबित हो रहे हैं। पीड़ित पत्रकार के साथ खडे होना, धैर्य देना आदि इन संगठनों की चिन्ताओं में शामिल नहीं है। व्हाटसएप् पर निंदा करने तक जिम्मेदारी निभायी जाती है। डीएनए के पत्रकार सुधीर सूर्यवंशी पर जानलेवा हमले के बाद पत्रकारों की सुरक्षा का मामला गरमाया था लेकिन अब फिर सब कुछ पहले जैसा हो गया है। हमलवरों के सत्ता पक्ष से जुड़े होने के कारण विपक्ष ने इस मुददे को पकडे रखा। विधानसभा के उस सत्र में पत्रकारों की सुरक्षा कानून बनाया गया तो इसके लिए तमाम संगठनों में श्रेय लेने की होड मच गयी। अखबार सवाल उठाते हुए लिखता है कि यह कोई नहीं देख रहा कि कानूनी उस पर प्रगति शून्य है। पत्रकार सुरक्षा कानून सम्बन्धी विधेयक की मंजूरी के बाद उसे कानूनी स्वरूप नहीं दिया जा सका है। अखबार ने अमरावती के प्रशांत काम्बले, पालघर के न्यूज 24 के संजय सिंह और वृत्तमानस अखबार के संजय गिरी अथवा कल्याण के केतन बेटावदकर सब मारपीट की शिकायत तक सीमित होकर  रह गये। 
अखबार ने पूरे साहस के साथ लिखा है कि राजनीतिक दबाव के चलते पुलिस शिकायत दर्ज नहीं करती। धारा 307 तक नहीं लगायी जाती। इसकी वजह पत्रकार संगठनों की मजबूती न होना है। अकेला पत्रकार कुछ नहीं कर पाता। अखबार हमले का शिकार होने वाले पत्रकारों की पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखता है कि जिस अखबार के लिए संवाददाता दर दर की ठोकरे खाता है उसका सम्पादक भी साथ खड़ा नहीं होता। अखबार प्रश्न करता है कि अगर अपराध दर्ज हो भी गया तो क्या गारंटी है कि जांच सही दिशा में होगी। सुपारी लेकर हमलावरे के खिलाफ गिरफ्तारी यदि हो भी गई तो भी हमले के पीछे का मूल उदेदश्य या मास्टरमाइंड कभी सामने नहीं आता। सूर्यवशी प्रकरण का जिक्र दोहराते हुए दबंग दुनिया अखबार ने लिखा कि हाईकोर्ट ने पुलिस की निष्क्रियता पर उंगली उठायी थी लेकिन इसके बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ा। अखबार मानता है कि सुधीर मामले को हाईकोर्ट में ले जाने में सफल रहे लेकिन हर पत्रकार ऐसा नहीं कर पाता। उनके पास उतनी आर्थिक शक्ति नहीं होती कि कोर्ट का दरवाजा खटखटा सके। हर दिन खबर देने के साथ साथ न्यायालय के चक्कर काटना संभव नहीं है। कम वेतन और नौकरी मे अनिश्चितता की तलवार उसे रोके रखती है। वह न्याय मांगने जाये तो कैसे जाये। मामला उठाने वाले पत्रकारों पर फर्जी मुकदमों का उल्लेख करते हुए अखबार ने लिखा है कि पत्रकार को झूठे प्रकरणों में संलिप्त दिखाकर उसके खिलाफ केस दर्ज किये जाते हैं। कभी हफ्ता वसूली तो कभी अट्रोसिटी के अपराध में फंसा दिया जाता है। शहीद अंसारी, सुनील टेपे के मामले इस फर्जी कार्रवाई के उदाहरण हैं।
मुम्बइ्र प्रेस क्लब में सस्ती दरों पर उपलब्ध होने वाली शराब बेचने की सुविधा पर भी दबंग दुनिया अखबार तंज करता है। मुम्बई पे्रस क्लब के अध्यक्ष कुमार केतकर की भूमिका पर भी अखबार सवाल उठाता है। चार चार माह तक वेतन से तरसते पत्रकारों के हक में कोई आवाज नहीं उठाता। अखबार मालिकों के खिलाफ एक शब्द नहीं बोला जाता। ऐसे तथाकथित पत्रकारों के चलते पत्रकारिता बदनाम हो रही है। अखबार ने सुधीर शुक्ला पर हमलावरों के बारे में इशारा देते हुए लिखा है  िकइस हमले के पीछे उषाबाई कांबले और उसकी डेढ़ वर्षीया नातिन की हत्या करने वालों की भूमिका हो सकती है। पत्रकारों पर हमलों की संख्या का भी अखबार ने विवरण दिया है। इसमें भाजपा शासित मध्य प्रदेश नम्बर वन पर है जहां सर्वाधिक 43 हमले हुए। आन्ध्र प्रदेश में 07, राजस्थान और त्रिपुरा में 05-05 और उत्तर प्रदेश में 04 हमले का जिक्र किया गया है। 


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