कब नपेंगे दो नम्बर के पत्रकार - संजय कश्यप 

11-01-2018 0:22:34 पब्लिश - एडमिन



कब नपेंगे दो नम्बर के पत्रकार - संजय कश्यप न वेतन न विज्ञापन, फिर भी ऐश, क्यो  नहीं जाती सरकार की नजरें

नई दिल्ली। केन्द्र सरकार के फर्जी पत्रकारों पर अंकुश लगाने के संकेतों से एक ओर जहां मिशन पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों ने राहत की सांस ली है वहीं पत्रकार की आड़ में ब्लेक मेलिंग करने वाले उन स्वम्भू पत्रकारों की नींद हराम हो गयी है जिन्होंने आजादी के आन्दोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रकारिता को अपनी काली करतूतों से कलंकित करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। आये दिन स्वयम्भू पत्रकारों के फर्जीवाड़े और ब्लैकमेलिंग से जुड़ी घटनाएं प्रकाश में आती रहती हैं जिनसे अच्छे और सच्चे पत्रकार खासे आहत होते हैं।

देश का कोई ऐसा राज्य और शहर स्वयम्भू पत्रकारों की करतूतों से अछूता नहीं है। इलेक्ट्रोनिक्स मीडिया के प्रचलन ने फर्जी पत्रकारिता को कहीं अधिक बढ़ावा दिया है। कुछ इलाकों तक सीमित स्थानीय चैनलों की आईडी थामे तथाकथित पत्रकार आये दिन कहीं न कहीं फर्जीवाड़े और ब्लैकमेलिंग के आरोपों में पकड़े जाते हैं जिनसे पत्रकार जगत की विश्वसनीयता पर संकट के बादल मंडराने लगते हैं। कहते हैं कि अच्छे और बुरे लोग हर क्षेत्र में होते हैं। पत्रकारिता भी एक ऐसा ही क्षेत्र हैं जहां दोनों किस्म के पत्रकार मौजूद हैं। एक वह है जो जान जोखिम में डालकर बदमाशों, माफियाओं को बेनकाब करते हैं और कभी कभी जान भी गंवा देते हैं तो दूसरी ओर फर्जी पत्रकारों की एक ऐसी जमात है जो कहीं नजर न आने वाले समाचार पत्रों के परिचय पत्र और चैनलों की आईडी लिये हर दिन नया शिकार करने निकल पड़ते हैं। इनके निशाने पर आम तौर वह लोग आते हैं जो कहीं न कहीं अपने कारोबार में हेराफेरी अथवा धांधली कर मुनाफा कमाते हैं। ऐसे लोगों में अक्सर खनन और शराब कारोबारी इनका निशाना बनते हैं।

शराब की खेप या खनन सामग्री से लदे वाहनों की सूचना पर फर्जी पत्रकार आनन फानन में वहां पहुंच जाते हैं और ऐसे सवाल जवाब करते हैं मानों पत्रकार न होकर पुलिस या सरकारी अधिकारी हो। जो जरा सा झिझक या डर जाता है उसकी शामत आ जाती है। नियमों को ताक पर रखकर खनन या शराब का कारोबार करने वाले कार्रवाई के खौफ से तथाकथित पत्रकारों के दबाव में आ जाते हैं और थोड़ी बहुत रकम देकर पीछा छुड़ा लेते हैं। विवादों का पर्याय बन चुके एचआरडीए के अधिकारियों और कर्मचारियों से सांठगांठ कर अनुमति के विपरीत बनने वाले भवन स्वामी भी धनलोभी मीडियाकर्मियों का शिकार बन जाते हैं। फर्जी बैनामे कर जमीनों की खरीद फरोख्त करने वाले प्रापर्टी डीलर भी कमाई का जरिया होते हैं। कई मामलों में कुछ पत्रकारों की संलिप्तता उजागर भी हो चुकी है।

देश के अन्य राज्यों की तरह उत्तराखंड में फर्जी पत्रकारों की लम्बी चौड़ी जमात है जिनके काले कारनामे आये दिन सुर्खियों में छाये रहते हैं। राजधानी देहरादून से लेकर तीर्थनगरी हरिद्वार और टूरिस्ट नगर नैनीताल सहित उत्तराखंड के छोटे बड़े शहर हर जगह तथाकथित पत्रकारों के गु्रप मौजूद है जो ब्लैकमेंिलग का कोई मौका नहीं छोड़ते। हालांकि अब परिस्थितियां बदल भी रही है। लोगों में जागरूकता आयी है और समझदार लोग स्वयम्भू पत्रकारों का पहचानने लगे हैं। हरिद्वार में खनन कारोबारियों ने वसूली के लिए पत्रकारों की जमकर पिटाई भी की। कुछ पत्रकार पुलिस के हत्थे भी चढ़ चुके हैं, बावजूद इसके तथाकथित पत्रकारों के हौंसले बुलन्द हैं। वसूली के चक्कर में पिटने और जान बचाकर भागने वाले मीडियाकर्मियों के कई मामले आम हो चुके हैं। ऐसे पत्रकारों में कुछ बेशर्म भी हो गये हैं और ‘बदनाम होंगे तो क्या नाम न होगा’ पर अमल करते हुए पिटने, जान बचाकर भागने और पुलिस के हत्थे चढ़ने के बाद भी ब्लैेकमेलिंग करने के लिए मैदान में उतर आते हैं। दूसरी ऐसे पत्रकारों की अच्छी खासी संख्या मौजूद है जिनके वीकली या दैनिक समाचार पत्र प्रसार के नाम पर शून्य हैं लेकिन उन्होंने अवैध धन्धों में लिप्त लोगों से सांठगांठ कर लाखों की सम्पत्ति जुटा ली है। जमीन खरीद और बैंक में मोटी धनराशि जमा कराने पर रकम का स्त्रोत पूछने का नियम बनाने वाली सरकार ऐसे पत्रकारों की ओर से आंखें मूंदे हुए हैं जिन्हें अखबार से वेतन के नाम पर कुछ नहीं मिलता या मानदेय के तौर पर इतनी कम राशि मिलती है कि मोबाइल और पेट्रोल का खर्च ही निकलता है लेकिन वह आधुनिक बाइकों की सवारी करते नजर आते हैं। हाथों में बेशकीमती मोबाइल है।

पत्रकारिता में तथाकथित पत्रकारों के समानान्तर ऐसे पत्रकारों की संख्या भी कम नहीं जो समाज और मीडिया जगत में एक पत्रकार के रूप में पहचान रखते हैं लेकिन अखबार या चैनल से वेतन न मिलने के बावजूद शानदार जीवन व्यतीत कर रहे हैं। तीन से पांच हजार रूपये मानदेय पाने वाला पत्रकार अगर दो तीन हजार रूपये की जैकेट पहन और जेब में 16  से 20 हजार का मोबाइल लेकर 80 हजार से लेकर लाख सवा लाख की बाइक पर सवार होकर पत्रकारिता करने निकलता है तो उसकी आमदनी के स्त्रोत की कल्पना की जा सकती है। कुछ पत्रकार तो कारों में चलते हैं। इन पत्रकारों में ऐसे पत्रकार भी शामिल हैं जो अपना साप्ताहिक अखबार चलाते हैं। सरकारी विज्ञापन लेने के लिए प्रसार के फर्जी आंकड़े दर्शाकर अधिकारियों से सांठगांठ कर विज्ञापन लेते है। हालांकि केन्द्र सरकार द्वारा समाचार पत्र प्रकाशन के लिए कड़े प्रावधान किये जाने से परिस्थितियां बदलने के आसार नजर आये हैं लेकिन यह तभी संभव होगा जब इन प्रावधानों को लागू कराने वाला सिस्टम इमानदार होगा वर्ना पत्रकारिता की आड़ में चल रहे गोरखधंधे पर लगाम लगाना मुश्किल होगा।

समाज और व्यापार-उद्योग जगत से भ्रष्टाचार के खात्मे को प्रतिबद्ध नजर आने वाली केन्द्र की मोदी सरकार को उन पत्रकारों और सम्पादकों पर भी नजर टेढ़ी करनी होगी जो वेतन और आमदनी के पारदर्शी स्त्रोत न होने के बावजूद लखपति और करोड़पति बनकर शानदार जिन्दगी जी रहे हैं। खनन, शराब, प्रापर्टी और बिल्डर्स की दरियादिली से भरपूर पैसा कमाने वाले पत्रकारों/सम्पादकों पर प्रशासन का डंडा कब चलेगा इस बारे में सरकार और उसका गुणगान करने वाले लोग ही बता सकते हैं। राजनीति के क्षेत्र मंे कई नामचीन नेता आय से अधिक सम्पत्ति अर्जित करने के मामलों में आरोपित होकर कानून का सामना कर रहे हैं लेकिन मीडिया जगत के छोटे बड़े दिग्गज सरकार की कार्रवाई से अभी तक सुरक्षित है जो कहीं न कहीं दो संभावनाओं की इशारा करता है, पहला यह कि सरकार डरती है या दूसरी यह है कि ऐसे पत्रकार शासन-प्रशासन तक इतनी पैठ बना चुके हैं कि वह आराम से बच सकते हैं। देहरादून में पूर्व सीएम का स्टिंग करने वाले एक पत्रकार की दास्तां पत्रकारिता जगत को कमाई का धंधा बनाने की जीती जागती गाथा है। यूपी से आये इस तथाकथित दिग्गज पत्रकार ने कैसे राजनेताओं और ब्यूरोक्रेसी मंे सांठगांठ कर सम्पत्ति जुटाई यह खासा चर्चा का विषय रही। 

सूत्रों की माने तो हर जिले में ऐसे विभागों से बाकायदा पत्रकारों को प्रतिमाह रकम पहुंच रही हैं जिन विभागों में कहीं न कहीं अनियमितताएं बरती जाती हैं। इनमें निर्माण, निजी व सरकारी परिवहन, आपूर्ति आदि से जुड़े सरकारी सरकारी विभाग शामिल हैं। सूचना के अधिकार अधिनियम ने भी ब्लैकमेलर किस्म के पत्रकारों को बढ़ावा दिया है। सूचना मांगने के बाद उसे सार्वजनिक करने की धमकी देकर वसूली करना ब्लैक मेलर टाइप पत्रकारों के लिए आमदगी का बढि़या जरिया बन चुका है। आम आदमी का कहना है कि समय के साथ लोकतंत्र के तीनों स्तम्भों की पारदर्शिता और विश्वसनीयता में आयी कमी को दूर करने के लिए लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ यानि मीडिया का इमानदार होना जरूरी है। इमानदार मीडिया ही व्यवस्था को पटरी पर लाने में सक्षम है लेकिन बाजारवाद की आंधी मंे अखबार और चैनल भी मिशन के बजाय कारोबारी संस्थान बनकर रह गये हैं जहां ऐेसे ऐसे लोगांे की नियुक्ति को प्राथमिकता दी जाती है जो कमाकर देने में सक्षम हो बाकी योग्यता और प्रतिभा नजर अंदाज कर दी जाती है। कई चैनल अपने संवादादाताओं को वेतन भत्ता आदि देने के बजाय उन्हें माइक आईडी देते समय मंथली पैकेज तय करते हैं। संवाददाता तयशुदा धनराशि दे देता है तो ठीक वर्ना दूसरे की नियुक्ति में देरी नहीं की जाती। कई भुक्तभोगी अपनी पीडा बयान कर चुके हैं।

(आक्रोश के एडिटर संजय कश्यप की कलम से) 

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