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सीनियर जर्नलिस्ट की व्यथा-कथाः- "हादसों के दस्तखत"

15-01-2018 19:31:28 पब्लिश - एडमिन



बात बहुत पुरानी नहीं जुलाई 2016 की है जब मध्य प्रदेश के नवाबी शहर भोपाल में कई मीडिया समूहों में काम कर चुके एक वरिष्ठ पत्रकार की पुत्री ने पिता की आर्थिक तंगी से परेशान होकर आत्महत्या कर ली थी। कक्षा आठ में पड़ने वाली वह किशोरी अपने पिता पर बोझ नहीं बनना चाहती थी। इन पत्रकार महोदय का शुमार वरिष्ठ पत्रकारों में होता है लेकिन बावजूद इसके उन्हें वेतन के लिए मालिकों के सामने गिडगिडना पड़ा। वेतन तो नहीं मिला अलबत्ता उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया था। कहने को यह घटना कमोबेश वैसी ही है जैसी आम तौर पर अखबारों में प्रकाशित होती रहती है कि फलां शहर में गरीबी या बीमारी अथवा कर्ज के चलते एक व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली। 

यह घटना इसलिए याद आ गयी कि कमोबेश जिन परिस्थितियों से मध्य प्रदेश के उस नामचीन जर्नलिस्ट को गुजरना पड़ा उन्हीं परिस्थितियों से मैं स्वयं रूबरू हुआ हूं बल्कि अभी भी हूं। जिक्र इसलिए भी सम सामयिक हैं क्योंकि मेरी पुत्री भी कक्षा आठ की ही छात्रा है। जिक्र इसलिए भी स्वाभाविक हैं क्योंकि मेरी पुत्री भी आत्महत्या करने वाली पत्रकार की पुत्री की तरह संवदेनशील और समझदार है। दूसरे शब्दों में यह कहना ज्यादा मुनासिब होगा कि मेरी परिस्थितियों ने उसे समयपूर्व समझदार बना दिया है। दो साल पहले जो बालिका पूरे परिवार में सब बच्चों के मुकाबले कहीं अधिक हंसमुख और जिन्दादिल थी वह आज धीर गम्भीर हो चुकी है और ऐसा कोई दिन व्यतीत नहीं होता जब वह मुझसे भविष्य की जरूरतों की पूर्ति के अनुत्तरित प्रश्न का उत्तर न मांगती हो। मैं उसके ऐसे किसी प्रश्न का समाधानपूर्ण उत्तर र नहीं दे सकता जिसका उत्तर मैं अपने आप से मांग रहा हूं लेकिन गुजरे एक डेढ़ बरस में कभी नहीं मिला।

प्रोफेशनल होने के बजाय इमोशनल होकर फैसले लेने की पीड़ा क्या होती है इसे अब महसूस किया है। साथ काम करने वाले तरक्की के पायदान चढ़ते हुए वह सब हासिल करने में कामयाब हुए जो मेरे लिए सपना था और अब शायद पूरा होने के आसार नहीं है या यूं कहिये कि उतना परिश्रम करने की हिम्मत और क्षमता नहीं रही। आज जब वही पुराने साथी मिलते हैं तो दुआ सलाम के बाद एक बात अवश्य सुनने को मिलती है कि-ः‘‘ आपने बेकार में एक ही जगह रहकर अपनी प्रतिभा को कुंद कर लिया वर्ना आप किसी बड़े दैनिक में बड़ी पोस्ट पर होते।’’ पुराने साथी ही नहीं बल्कि मीडिया जगत के अधिकांश साथी भी मेरी इस योग्यता का बखान करते नहीं थकते। मुमकिन है कि वह सच बोलते हो लेकिन इतनी तो सच्चाई है कि शहर के अपनत्व भरे माहौल से गहराई से जुड़ने के कारण मैं कहीं अन्यत्र नहीं जा पाया वर्ना अवसर भी बहुत मिले। आज हालात यह है कि जिन्दगी खोये हुए अवसरों की दास्तान बनकर रह गयी है। 

बहरहाल बात वही आती है कि समाज के एक आम आदमी की आत्महत्या और पत्रकार के परिजन की आत्महत्या में क्या फर्क है! बात जब पत्रकार की नाबालिग बेटी की आत्महत्या की होती है तो समूचा तंत्र कटघरे में खड़ा नजर आता है। बरबस ही यह सवाल उठता है कि आजादी के सात दशक गुजरने के बावजूद आखिर क्यों लोकतंत्र के चारों स्तम्भ ऐसी कारगर व्यवस्था नहीं दे सके कि रात दिन मेहनत करने वाला कामगार बिना किसी तनाव के अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। दोष किसका है? विधायिका का या कार्यपालिका का? इस सवाल का जवाब आज भी किसी कि पास नहीं। पत्रकार हितों के लिए सरकारों के सरंक्षण में बनने वाली तमाम समितियां और कोष तथा अन्य प्रदत्त सुविधाएं सिर्फ मान्यता प्राप्त पत्रकारों के हिस्से में आती है। ऐसी समितियांे और कोष से लाभान्वित होने के लिए मान्यता प्राप्त होना मायने रखता है न कि कष्टप्रद जीवन व्यतीत करने या बीमारी से जूझने वाले पत्रकार की आर्थिक तंगी। मान्यता ही पत्रकार होने का पैमाना बन गयी है अगर कोई मान्यता प्राप्त नहीं तो वह पत्रकार नहीं। अधिकारी हो या मंत्री अथवा राजनेता सबकी नजरों मंे मान्यता प्राप्त पत्रकार ही पत्रकार माना जाता है, बाकी सब बेकार है चाहे मान्यता प्राप्त पत्रकारों से बेहतर लिखने वाले ही क्यों न हो!

पत्रकार की इन्हीं समस्याओं को दूर करने के लिए कुछ जांबाज कलमवीरों ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कराने की लडाई लड़ी जिसके लिए वह बधाई के पात्र है। देश के मीडिया जगत में इस समय मजीठिया वेज बोर्ड की चर्चा है। पत्रकार यह लड़ाई जीत चुके हैं लेकिन सरकार अभी तक मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू कराने में सफल नहीं हुई है तो फिर यह प्रश्न कौंधता है कि सरकार मीडिया घरानों की नाराजगी के जोखिम से बचना चाह रही है या उसे लोकतंत्र के इस चौथे स्तम्भ को मजबूती देने वाले मीडियाकर्मियों की जरूरतों से सरोकार नहीं। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है कि देश की आजादी में बतौर स्वतंत्रता सेनानी प्रमुख भूमिका निभाने वाला मीडिया जगत मीडियाकर्मियों के शोषण पर महज तमाशबीन बन कर रह गया है। बेशक वह पत्रकार सराहना के पात्र है जिन्होंने कैरियर और नौकरी दांव पर लगाकर पत्रकार हितों की लड़ाई लड़ी लेकिन रोचक बात यह है कि अखबार मालिकों के हितों की रक्षा को वह महंगे वकील खड़े हुए जिनकी फीस भरने की कुव्वत एक आम आदमी में नहीं है। देश में न्याय की स्थापना करने में सर्वाधिक महत्वपूर्ण स्थान रखने वाला अधिवक्ता अगर पेशे की दुहाई देकर शोषित के हितों की रक्षा के बजाय शोषकों के रक्षक की भूमिका निभाने को मजबूर हो तो स्थिति की गम्भीरता को समझा जा सकता है। 

मजीडिया वेज बोर्ड हो या इनसे पूर्व के बछावत और मणिसाणा वेज बोर्ड मीडियाकर्मियों को हमेशा अपने हितों की रक्षा के लिए संधर्ष करना पड़ा है जो देश में समान अधिकार के सिद्धान्त पर प्रश्नचिन्ह लगाता है। आखिर क्यों परिश्रम करने के बावजूद कामगार को अपने वेतन या मजदूरी के लिए मालिकों का मुंह ताकना पड़ता है। 

अपने ढाई दशक की पत्रकारिता के दौरान यह अनुभव हुआ कि समाचार पत्र समूह को परिवार की संज्ञा देने वाले मीडिया समूहों के मालिक ऐसा कहकर कर्मचारियों का भावनात्मक शोषण करते हैं। इसी परिवार के किसी सदस्य पर कोई संकट खड़ा हो तो इस परिवार के कथित मुखिया यानि समाचार पत्र के स्वामी हाथ खड़े कर देते हैं। कभी अखबार के घाटे में चलने की दुहाई तो कभी विज्ञापन न मिलने की दलील। है। अफसोस की बात तो यह है कि पत्रकार हितों की रक्षा का दम भरने वाले पत्रकार संगठन भी शोषित पत्रकार के साथ खड़े होने में कतराते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड की मांग को आगे आने वाले पत्रकारों की हिम्मत की तारीफ करने वाले पत्रकार भी अपने साथी पत्रकार के हितों की रक्षा में यह कर किनारा कर लेते हैं कि श्रम विभाग के अधिकारी पंूजीपति मालिकों के आगे नतमस्तक हैं। ऐसे में आर्थिक तंगी से गुजर रहा अदालती लड़ाई कैसे लड़ सकता है। जिसके सामने परिवार के किसी बीमार का इलाज, सन्तान की पढ़ाई के खर्च के साथ साथ दो वक्त का भोजन ही चुनौती बनकर खड़ा हो वह किसी वकील की फीस भरने की हिम्मत कैसे कर सकता है। पत्रकारों की यही आर्थिक तंगी ही मीडिया मालिकों के लिए वरदान साबित होती है। यह महज संयोग है या विधि की विडम्बना कि जो पत्रकार समाज के विभिन्न तबकों के साथ होने वाले अन्याय और शोषण को अपनी लेखनी से दुनिया के सामने बयान कर व्यवस्था को बेनकाब करता है वह खुद भी अपने कार्यक्षेत्र में शोषण का शिकार है लेकिन अपना दर्द बयान करने की उसे इजाजत नहीं है।

एक दैनिक समाचार पत्र को डेढ़ दशक तक सेवाएं देने वाले किसी पत्रकार या ऐसे एडिटर को अखबार घाटे में होने का हवाला देकर निकाल दिया जाये अथवा उसे खुद छोड़ने को मजबूर होना पड़े तो उस पर और उसके परिवार पर क्या गुजरेगी? लगभग समस्त विषयों पर समान पकड़ रखने वाले किसी जर्नलिस्ट को यदि पांच छह हजार का वेतन दिया जाये तो उसका परिवार कैसे भरण पोषण करे और कैसे वह बच्चों को उच्च शिक्षित करने का सपना देख सकता है। ऐसे एक नहीं अनेक सवाल है जिनका जवाब हर शहर और नगर के उन पत्रकार संगठनों को खोजना होगा जो आये दिन पत्रकारिता की गरिमा को अक्षुण्ण रखने और पत्रकार हितों की रक्षा को सदैव सजग रहने का संकल्प दोहराते हैं। अपनी आधी उम्र पत्रकारिता को समर्पित करने वाला कोई जर्नलिस्ट अगर आज स्वयं अपना इलाज कराने में खुद को लाचार महसूस करे तो यह पूरे मीडिया जगत के लिए शर्म की बात है। 

आर्थिक तंगी के बीच बीमारी से लड़ते हुए कैसे निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता की जा सकती है? इसका जवाब मीडिया जगत के उन लोगों को देना होगा जो पत्रकार हितों की रक्षा का दम भरते हैं। क्योंकि यह लेख पत्रकारों के शोषण पर लिखा गया लेख मात्र नहीं बल्कि अपनी व्यथा कथा है। इस व्यथा से नगर के साथी पत्रकार बखूबी परिचित हैं। अच्छे लोग भी हैं जिन्होंने संवेदना भी जतायी और संकट में साथ भी दिया लेकिन इतना ही काफी नहीं है। सवाल आधी उम्र पार करने के बाद आजीविका चलाने का है। बच्चों को पढ़ाने और बीमारी के इलाज का है। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कराने की जंग लड़ने वाले जांबाज पत्रकारों की प्रशंसा करना बहुत अच्छी बात है लेकिन खुद में भी उतना नैतिक साहस जगाकर साथी की मदद को खड़ा होना पड़ेगा। क्योंकि यहां सवाल एक पत्रकार का नहीं बल्कि हर उस पत्रकार का है जो निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता का सपना लेकर पत्रकारिता में आता है और संघर्ष और संकट के दौर में सहारा मिलने की आस लेकर शहर के पत्रकार संगठनों से जुड़ता है। 

अन्त में धन्यवाद संगठन के उन लोगों का जिन्होंने समय समय पर संवेदना भी जतायी और सहायता भी प्रदान की। क्षमा याचना उनसे जिन्हें मेरा यह कदम अच्छा नहीं लगा।

नोटः- इस व्यथा को व्यक्त नहीं करना चाहता था लेकिन ‘‘आक्रोश4मीडिया’’ के सम्पादक श्री संजय कश्यप की इस सलाह पर कि कम से कम नये पत्रकारों को इमोशनल के बजाय प्रोफेशनल होकर काम करने की सीख मिलेगी, लिखना पड़ा।

(दो दशकों तक डेस्क एडिटर के रूप में काम कर चुके सीनियर जर्नलिस्ट आजाद भारती की कलम से।)

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