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मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू न करने वाले पत्र हो विज्ञापन सूची से बाहर

21-01-2018 23:02:17 पब्लिश - एडमिन


देश भर के मीडिया जगत में इस समय जहां समाचार पत्रों के प्रकाशन हेतु केन्द्र सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय द्वारा जारी की गयी सख्त गाइड लाईन को लेकर चर्चा है तो वहीं सुप्रीम कोर्ट के मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने पर कशमकश का माहौल है। सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद कुछ अखबारों ने तो मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू कर दिया है तो कुछ न आंशिक रूप से लागू किया है लेकिन अधिकांश अखबार मालिक मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के बजाय छंटनी का रास्ता अपना रहे हैं। देश के कई नामचीन अखबारों को कोर्ट की फटकार लग चुकी है, बावजूद इसके वह मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने से कतरा रहे हैं और कानून के सहारे बचने की कोशिश करते दिख रहे हैं।
मीडिया क्षेत्र में कार्यरत पत्रकारों/उप सम्पादकों/ सह सम्पादकों सहित अन्य कार्मिकों को समुचित वेतन उपलब्ध कराने को लेकर जब जब आयोग बने तब तब मीडिया जगत आयोग की सिफारिशों को लागू करने से बचता नजर आया। बछावत आयोग की सिफारिशें हो या मणिसाणा वेज बोर्ड की सिफारिशों को लागू करने के आदेश, अखबार मालिक हमेशा कन्नी काटते रहे। इसकी मुख्य वजह संभवतः यह है कि सरकारें मीडिया घरानों से नाराजगी का जोखिम लेने से बचती हैं। सरकारों को बखूबी मालूम है कि मीडिया घराने यानि अखबारों के मालिक अपने कामगारों पर खासा असर रखते हैं। अखबार में क्या छपना चाहिए और क्या नहीं, यह सब मालिकों की इच्छा पर निर्भर होता है। 
सरकार से भारी भरकम विज्ञापन की आस में सरकार विरोधी खबरों से मालिक बचते हैं। इसकी बड़ी वजह यही है कि अखबार अधिकतर पंूजीपतियों के होते हैं जिनके अन्य कारोबार भी होते हैं। उस कारोबार को सरकारी कार्रवाई से बचाने के लिए पंूजीपति सरकार की नाराजगी का जोखिम उठाने से परहेज करते हैं। मीडिया और सरकार दोनों को एक दूसरे की जरूरत होती है ऐसे में दोनों एक दूसरे को खुश रखने की पालिसी पर चलते हैं। मौजूदा दौर में साफ साफ नजर आ रहा है कि सरकार की नाकामियों से जुड़े समाचारों को कूडेदान में डालकर सरकार का गुणगान करने वाले अखबारों और चैनलों को सरकार से मिलने वाले विज्ञापनों में कोई कमी नहीं है जबकि सरकार विरोधी चैनल और अखबारों को नाम मात्र का विज्ञापन मिल रहा है। परोक्षतः मीडिया पर सराकार का नियंत्रण नजर आ रहा है। सत्ता के गलियारों से लेकर सचिवालय तक में ऐसे पत्रकारों का बोलबाला है जो सत्ता के करीबी हैं। वस्तुतः वर्तमान मीडिया जन सरोकारों का माध्यम न होकर विशुद्ध रूप से कारोबार बन चुका है जिसमें मालिक मुनाफा चाहता है। कामगारों के वेतन बढ़ाकर आमदनी में कमी के लिए कोई तैयार नहीं है लेकिन उसे विज्ञापन चाहिए वह भी भरपूर। विज्ञापन की लालसा ने अखबार मालिकों ने कार्मिकों केे पेंच कस रखे हैं। बेतहाशा बढ़ी मंहगाई के दौर में कोई बेरोजगार होने का खतरा मोल नहीं लेना चाहता। जो स्थिति अन्य क्षेत्र के कामगारों की है वही प्रिंट मीडिया के कामगारों की है। जिस तरह अन्य क्षेत्रों में न्यूनतम वेतन/सुविधा और भत्ता दिलाने में श्रम विभाग गम्भीर नजर नहीं आता, वही स्थिति मीडिया जगत में है। आये दिन अखबारों में विभिन्न अखबारों में आलाधिकारियों के औचक निरीक्षण के समाचार प्रकाशित होते हैं लेकिन क्या आपने कभी यह खबर भी पड़ी है कि अमुक जनपद में श्रमायुक्त या श्रम निरीक्षक ने किसी अखबार के कार्यालय पर छापा मारकर वहां कार्यरत कार्मिकों को दिये जाने वाले वेतन एवं अन्य सुविधाओं की जानकारी जुटायी या दस्तावेज खंगाले। 
ऐसा इसलिए नहीं होता क्योंकि श्रम विभाग को भी मालूम है कि मीडियाकर्मी मजबूरियों की डोर में इस कदर बंधे हैं कि वह छटपटा तो सकते हैं लेकिन बगावत नहीं कर सकते। अगर बगावत करेंगे तो बाहर का रास्ता दिखा दिया जायेगा। वेतन बढ़ोतरी की मांग को लेकर किसी संस्थान से किनारा करने वाले पत्रकार को दूसरा संस्थान पर भी नियुक्ति देने से कतराता है। श्रम विभाग से लेकर सरकार तक मीडियाकर्मियों की मजबूरियों को समझते हैं लिहाजा चाहे मजीठिया वेज बोर्ड हो या बछावत और मणिसाणा वेज बोर्ड की सिफारिशें वह महज चर्चा का विषय बन कर रह जाती है। इनका लाभ बहुत कम लोगों को मिलता है। 
रोचक पहलू यह है कि मीडियाकर्मियों से मधुर व्यवहार की बात हो या मीडिया को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण चैथा स्तम्भ करार देने वाला सत्ता प्रतिष्ठान तथा पूरा राजनीतिक तंत्र वह परोक्षतः मीडिया घरानों से सम्बन्ध खराब नहीं करना चाहते। राजनीतिक और सार्वजनिक मंचों पर मीडियाकर्मियों के हितों का उदघोष करने वाले नेता सभा सम्पन्न होने के बाद सब भूल जाते हैं। व्यवस्था के भ्रष्टाचार और सामाजिक बुराईयों के साथ साथ शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ मुखर होने वाला मीडियाकर्मी अगर खुद शोषण का शिकार है तो इसकी वजह सरकारों में इच्छा शक्ति की कमी है वर्ना क्या वजह है कि कई अन्य मामलों में आनन फानन में फैसले लेकर लागू कराने को प्रतिबद्ध सरकारे मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू न करने वाले पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों पर बैन लगाने और विज्ञापन सूची से बाहर करने का फैसला क्यों नहीं लेती। जब विधायक/मंत्री और डीएम द्वारा आहूत बैठक से नदारद रहने वाले या निर्देशों का उल्लंघन करने वाले कर्मचारियों और अधिकारियों का वेतन काटा जाता है, उनके विरूद्ध विभागीय कार्रवाई होती है, निलम्बन होता है तो फिर पत्र-पत्रिकाओं को अभयदान क्यों? सरकार द्वारा गठित किसी आयोग की सिफारिशें लागू न करना क्या किसी अपराध की श्रेणी में नहीं आता? अगर आता है तो सिफारिशों की अनदेखी करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की मान्यता रदद करने या विज्ञापन सूची से बाहर करने का आदेश लागू करने में संकोच क्यों? मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने वाले संगठनों को चाहिए कि वह सिफारिशें लागू न करने वाले पत्र-पत्रिकाओं की मान्यता रदद करने और उन्हें विज्ञापन सूची से बाहर करने की मांग को लेकर न्यायालय में दस्तक दें।
7 भास्कर गु्रप को झटका, 22 लाख 52 हजार 945 रिकवरी नोटिस 
फिरोजपुर में बतौर ब्यूरो काम करने वाले राजेन्द्र मल्होत्रा मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुसार भुगतान को लेकर दायर केस जीत गये। फिरोजपुर के सहायक कामगार आयुक्त सुनील कुमार भोरीवाल ने दैनिक भास्कर प्रबन्धन को 22 लाख 52 हजार 945 रूपये की वसूली के लिए रिकवरी नोटिस जारी कर दिया। मल्होत्रा ने मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुपालन में सहायक कामगार आयुक्त के समक्ष 17 (1) क्लेम किया था।
दैनिक भास्कर का प्रबन्धन देखनेवाली डीपी कार्प को जब रिकवरी नोटिस मिला तो उसने राजेन्द्र मल्होत्रा को बिहार के दरभंगा में तबादला कर दिया। मल्होत्रा ने अपने अधिवक्ता उमेश शर्मा के कथानुसार फिरोजपुर कोर्ट में याचिका दायर कर तबादले पर स्टे की मांग की। इंडस्ट्रियल कोर्ट अधिवक्ता ने अदालत में मजबूती के साथ राजेन्द्र मल्होत्रा का केस रखा जिस पर कोर्ट ने उनके स्थानान्तरण पर स्टे दे दिया। दैनिक भास्कर में स्टिंªगर थे। बाद में उन्हें रिपोर्टर और फिर चीफ रिपोर्टर नियुक्त किया गया। चीफ रिपोर्टर से उन्हें सीधे चीफ ब्यूरो बना दिया गया। चीफ ब्यूरो बनने के बाद राजेन्द्र मल्होत्रा ने प्रबन्धन से मजीठिया वेज बोर्ड की मांग कर दी। प्रबन्धन ने उनकी मांग को अनसुना करके मल्होत्रा का दरभंगा स्थानान्तरण कर दिया। स्थानान्तरण पर स्थगनादेश के बाद डीपी कार्प के सामने बकाया राशि चुकाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा।
स्थानान्तरण पर रोक के बाद जब राजेन्द्र मल्होत्रा कार्यालय पहुंचे तो उन्हें ज्वाइन नहीं करने दिया गया। बावजूद इसके मल्होत्रा हताश नहीं हुए और उन्होंने डीपी कार्प के मैनेजिंग डायरेक्टर सुधीर अग्रवाल, स्टेट हेड बलदेव शर्मा, कार्मिक विभाग के हेड मनोज धवन और एडिटर नरेन्द्र शर्मा सहित पांच लोगों पर कोर्ट की अवमानना करने का मुकदमा दर्ज करा दिया जिस पर सुनवाई चल रही है। मीडिया जगत में चमकदार कैरियर बनाने का सपना लेकर आनेवाले युवा जुझारू पत्रकारों का भविष्य अनिश्चितता के कितने अंधकार में होता है इसका उदाहरण इससे लगाया जा सकता है कि खबरिया चैनलों के सरताज माने जाने वाले न्यूज चैनल के स्ंिट्रगरों को उत्तराखंड के विभिन्न शहरों से एक के बाद एक करके हटा दिया गया लेकिन किसी को कुछ नहीं पता कि उनका कसूर क्या था!
 

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22-01-2018 9:56:53

सभी मीडियाकर्मी एकजुट हो जाएं तो अख़बार मालिको को झुकना ही पड़ेगा। साथ ही एक प्रतिनिधिमंडल प्रधानमंत्री से मिलकर ज्ञापन सोंपे। मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ। पटना लेबर कमिश्नर के आगे 45 लाख का दावा पेश कर चूका हूँ। अगली सुनवाई 2 फरवरी को है।