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भाजपा के नक्शे कदम पर यूपी प्रेस मान्यता समिति, मुस्लिम पत्रकार नदारद

05-02-2018 17:32:40 पब्लिश - एडमिन



इसे विडम्बना कहा जाये या मीडिया के सत्तामुखी होने का साक्ष्य कि यूपी प्रेस मान्यतासमिति में पहली बार किसी अल्पसंख्यक मीडियाकर्मी को जगह नहीं मिली है। यूपी के पत्रकार संगठनों की नीयत पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यूपी में एक भी ऐसा मुस्लिम मीडियाकर्मी नहीं जिसे मान्यता समिति में रखा जाता। यह स्थिति तब है जबकि प्रदेश की राजधानी लखनउ में बेहतरीन उर्दू पत्रकारों की लम्बी चैड़ी जमात मौजूद हैं। दर्जनों वरिष्ठ पत्रकार विभिन्न पत्रकार संगठनों से जुड़े हैं लेकिन किसी संगठन ने किसी मुस्लिम पत्रकार को समिति में लेने के लिए नामित नहीं किया। पत्रकार संगठनों की इस कार्यशैली से साफ लग रहा है कि यह संगठन भी भाजपा की तर्ज पर मुस्लिम को टिकट न देने की नीति पर चलने लगे हैं।
गौरतलब है कि लम्बी कवायदों के बाद यूपी प्रेस मान्यता समिति का गठन किया गया है लेकिन इस समिति में एक भी मुस्लिम जर्नलिस्ट को जगह नहीं दी गयी। कागजी तौर पर समिति में हर वर्ग को प्रतिनिधित्व दिया गया सिवा मुस्लिम वर्ग को। जबकि प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया, न्यूज एजेंसियों से जुड़े प्रतिनिधियों को बराबर स्थान मिला है लेकिन मुस्लिम और उर्दू जगत की पूरी तरह अनदेखी कर दी गयी। यूपी राज्य मुख्यालय की प्रेस मान्यता समिति में लगभग आठ सौ मान्यता प्राप्त पत्रकार है जिनमें तकरीबन सौ पत्रकार मुस्लिम है इनमें 80 उर्दू मीडिया से आते हैं जबकि सौ पत्रकारों की मान्यता है। उर्दू मीडिया में दो दर्जन पत्रकार बहुसंख्यक वर्ग के हैं। राज्य मुख्यालय के पत्रकारों में उर्दू और मुस्लिम वर्ग का 15 फीसदी प्रतिनिधित्व है, बावजूद पत्रकार संगठनों ने इस वर्ग की अनदेखी की।
मान्यता प्राप्त पत्रकारों की निर्वाचित समिति के दोनो गुटों में नौ पदाधिकारी/सदस्य अल्पसंख्यक समुदाय से हैं। सूबे की सहाफत में गुजरे 20-25 साल से सक्रिय हिसाम सिद्दीकी, उबैद नासिर, हसीब सिददीकी, मौहम्मद शाहिद, हुसैन अफसर, तारिक खान, कमाल खान, मसूद, कुलसुम, नायला, अफरोज, परवेज जैसे नामचीन मान्यता प्राप्त प्रतिष्ठित पत्रकार हैं लेकिन पत्रकार संगठनों ने किसी को मान्यता समिति हेतु नामित करने की जहमत तक नहीं उठायी। हिसाम सिददीकी गत एक दशक से आईएफडब्लूजे से प्रेस क्लब के प्रतिनिधि के तौर पर प्रदेश की प्रेस मान्यता समिति में रहे हैं। जंगे आजादी में बेहतरीन निभाने वाली प्रदेश की उर्दू पत्रकारिता की इस अनदेखी की किसी को उम्मीद नहीं थी लेकिन ऐसा लगता है कि पत्रकार संगठन भी सत्तामुखी हो चुके हैं। स्व. इशरत अली सिददीकी, हयात उल्ला अंसारी से लेकर आबिद सुहैल जैसी दर्जनों हस्तियों ने उर्दू जर्नलिज्म में अपनी छाप छोड़ी है। इन पत्रकारों ने निष्पक्षता, निडरता और साम्प्रदायिक एकता के साथसाथ देशभक्ति से ओतप्रोत पत्रकारिता को प्रोत्साहित किया।
स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ‘‘संतुलन’’ और ‘‘समरसता’’ संदेश देने वाले पत्रकारों ने इस सिद्धान्त को क्यों दरकिनार कर दिया यह दोनों पत्रकार संगठनों के पदाधिकारी ही बता सकते हैं लेकिन सवाल तो बनता ही है। घोर आश्चर्य का विषय है कि किसी भी पत्रकार संगठन ने उर्दू पत्रकारिता या मुस्लिम वर्ग के किसी पत्रकार का नाम प्रेस मान्यता समिति के लिए नहीं भेजा। पत्रकार संगठनों की भेदभाव पूर्ण नीति से उर्दू पत्रकारिता से जुड़े पत्रकार निराश है। 
 

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