नौकरशाही की करतूतों की सजा मीडिया को..!

07-01-2018 15:58:08 पब्लिश - एडमिन



नौकरशाही की करतूतों की सजा मीडिया को..!
अपनी नाकामी का ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ने की कवायद,भारतीय मीडिया में अक्सर एक शेर प्रचलित है कि,खेंचो न कमानों को न तीरो तलवार निकालो,जब दुश्मन मुकाबिल हो तो अखबार निकालो कहने का मतलब यह है कि अखबार दुश्मनों को शिकस्त देने का सबसे कारगर और लोकतांत्रिक हथियार है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में इस हथियार का अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने बखूबी प्रयोग करते हुए ब्रिटिश हुकूमत की नींद हराम कर दी थी। आजादी के बाद भी भारतीय मीडिया आजादी के साथ काम करतारहा लेकिन प्रिंट मीडिया में पंूजीपति घरानों के दखल के बाद परिस्थितियां बदल गई। रहीसही कसर इलेक्ट्रोनिक मीडिया ने पूरी कर दी जो पूरी तरह बड़े बड़े औद्योगिक घरानों की जागीर बन चुका है। अब मीडिया जन सरोकारों का पैरोकार होने के बजाय मालिकों का हित रक्षक हो गया है जिस कारण स्वंत्रत पत्रकारिता पर प्रश्नचिन्ह लगा है। अखबारों में काम करने वाले पत्रकारों और सम्पादकीय विभाग के लोगों को जन सरोकारों को ताक पर रखते हुए मालिकों के फायदों के अनुसार खबरों का लेखन/चयन और प्रकाशन करना होता है। पंूजीवादी व्यवस्था के तहत निकलने वाले अखबार हो या खबरिया चैनल कहीं न कहीं सबकी निष्पक्षता को लेकर संशय बना हुआ है। पूंजीवादियों और सरकारों के हित परस्पर ऐसे जुड़े हुए हैं कि दोनों एक दूसरे के हितों की पूर्ति करने को मजबूर हैं।
हाल ही में उत्तराखंड की प्रदेश सरकार ने मीडिया की लगाम कसने की दिशा में विवादास्पद कदम उठाया है जिससे प्रदेश सरकार द्वारा आपातकाल की पुनरावृत्ति करने के संकेत मिल रहे हैं। सूबे में मीडिया को निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करने की सजा दी जा रही है जबकि मीडिया के बजाय सरकार के नौकरशाहों की है। सरकारी विभागों में बैठे विभीषणों को दंडित करने के बजाय सरकार ने मीडियाकर्मियों को निशाना बनाया है। गौरतलब है कि प्रदेश सरकार ने सचिालय सहित सभी सरकारी विभागों के कार्यालयों में मीडियाकर्मियों के प्रवेश पर रोक लगा दी है।
प्रदेश सरकार के मीडियााकर्मियों के सचिवालय और सरकारी विभागों के कार्यालयों में प्रवेश के फैसले पर मीडियाजगत और राजनीतिक गलियारों में तीखी आलोचना हो रही है। सरकार की दलील है कि कैबिनेट की बैठक होने से पूव ही लिये जाने वाले फैसलों और पेश किये जाने वाले प्रस्तावों के लीक होना र्दुभाग्यपूर्ण है। इन परिस्थितियों में कभी कभी फैसलों व प्रस्तावों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा कुछ फैसलों/प्रस्तावों में बदलाव करना पड़ता है। सरकार की दलील अपनी जगहसही है लेकिन सरकार ने जो कदम उठाया है उससे तो ऐसा लगता है कि वह अपने नौकरशाहों को बचाने के लिए मीडिया को बलि का बकरा बना रही है। कार्रवाई उन अफसरों पर होनी चाहिए थी जिनके विभागों से सम्बन्धित फैसले और प्रस्ताव लीक हुए लेकिन हो रहा है उल्टा। निशाना मीडिया पर साधा जा रहा है जो सरकार की नीयत पर सवाल खड़े करता है। राष्ट्रीय स्तर पर मीडिया को मैनेज करने के आरोपों से घिरी भाजपा की उत्तराखंड सरकार के फैसले को राज्य के मीडिया जगत ने तुगलकी फरमान करार देते हुए तुरन्त वापस लिये जाने की मांग की है।
गौरतलब है कि केन्द्र में भाजपा के पदारूढ़ होने के बाद प्रिंट एवं इलेक्ट्रोनिक मीडिया की निष्पक्षता पर निरन्तर सवाल उठ रहे हैं। कई नेशनल चैनलों के एंकरों की भूमिका भी सरकार के प्रवक्ता सरीखी नजर आने लगी है। सरकार के अन्धभक्तों की तरह काम करने की लालसा में कुछ चैनलों की टीआरपी में गिरावट दर्ज हुई है। कुछ एंकर और जर्नलिस्ट तो सरकार के चमचे के रूप में कुख्यात हो चुके हैं। इन पत्रकारों में एक नेशनल चैनल की महिला पत्रकार की एंकर भी शामिल है जो अपने शो के दौरान सरकार विरोधी बात सामने आने पर खुद सरकार की प्रवक्ता बनकर बचाव करने लगती है। निष्पक्ष पत्रकारिता को समर्पित कुछ पत्रकारों/एंकरो को सरकार समर्थक संगठनों की ओर से गालियां और धमकियां मिलने की खबरें भी सामने आ चुकी है। कहने का मतलब यह है कि एक ओर जहां राष्ट्रीय मीडिया से सरकार खुश है वहीं दूसरी ओर उसी पार्टी द्वारा शासित प्रदेश की सरकार मीडिया की सक्रियता पर अंकुश लगाने पर तुल गयी है। सरकार के इस निर्णय से यह संकेत मिल रहा है किसरकार प्रदेश के मीडिया जगत को अपने इशारों पर चलाना चाहती है ताकि उसके गलत फैसलों की जानकारी जनता तक न पहुंच सके। मीडिया की स्वतंत्रता पर कुठाराघात के इस कदम पर बवाल होना स्वाभाविक ही है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि ऐसा उस पार्टी की सरकार में हो रहा है जिसने आपातकाल में मीडिया पर तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व. श्रीमती इन्दिरा गांधी सरकार के खिलाफ मुखर आन्दोलन किया था। मीडिया की स्वतंत्रता बरकरार रखने और लोकतंत्र में तानाशाही के खिलाफ पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर लालकृष्ण आडवाणी तक ने वैचारिक मतभेद भुलाकर समाजवादी चिन्तक जेपी नारायण के झंडे तले संघर्ष किया था और जेल गये थे। आज परिस्थितियां बदल गई है। अतीत में मीडिया की आजादी की पक्षधर पार्टी आज मीडिया पर अंकुश लगाने की दिशा में बढ़ रही है तो इसे महज संयोग अथवा मजबूरी समझकर नजर अन्दाज नहीं किया जा सकता। मीडिया पर लगाम लगाने से पूर्व सरकार को उन अफसरों के पर कतरने चाहिए थे जिनके विभागों से सम्बन्धित सूचनाएं लीक हुई लेकिन सरकार ने अफसरों को अभयदान देते हुए मीडिया के कान उमेठने का फैसला किया जिसकी आलोचना स्वाभाविक ही है। 
सरकार के इस कदम से जाहिर हो गया है कि अगर किसी समाचार पत्र ने उसके फरमान को अनसुना किया तो उस पर भविष्य में सरकारी विज्ञापन में कटौती करने से भी नहीं परहेज नहीं किया जायेगा। केन्द्र सरकार की नीतियों की मार से सिसक रहे लघु एवं मध्यम वर्गीय अखबारों के साथ साथ अब उन समाचार पत्रों की स्वतंत्रता पर खतरे के बादल मंडराते दिख रहे हैं जो अपनी प्रसार संख्या के दम पर भरपूर सरकारी विज्ञापन ले रहे हैं। हालांकि हाल के कुछ दिनों में प्रदेश की राजधानी से प्रकाशित उस दैनिक पर सरकार की मेहरबानी बरस रही है जिसके मालिकों की सत्तारूढ़ दल से नजदीकियां जग जाहिर है जबकि उसी के समानान्तर लोकप्रियता और हैसियत रखने वाला दूसरा दैनिक विज्ञापनों की होड में पिछड़ रहा है। राजधानी के मीडिया जगत में सरकार की विज्ञापन नीति को लेकर भी मौके बेमौके चुटकियां ली जाने लगी है। लधु एवं मध्यम वर्गीय अखबारों पर की गई सख्तियों को अपने लिए अनुकूल समझकर खुश होने वाले बड़े क्षेत्रीय न्यूजपेपर्स के मीडियाकर्मी सरकार के फरमान को किस रूप में लेंगे यह भविष्य में सामने आयेगा। यह देखना दिलचस्प होगा कि बड़े अखबारों के नामचीन अखबार सरकार की खामियों को उजागर करने वाली निर्भीक पत्रकारिता के पथ पर चलेंगे या विज्ञापनों में कटौती से परेशान होकर सरकार के आगे नतमस्तक होने वाले अखबार मालिको के इशारे पर सरकार की कमियों व नाकामियों से आंखें मूंदकर पत्रकारिता करेंगे।
किसी जमाने में यूपी में समाजवादी पार्टी की मुलायम सिंह यादव की सरकार ने कई अखबारों के खिलाफ हल्ला बोल अभियान चलाया था जिसके तहत समाजवादी पार्टी कार्यकर्ता सरकार विरोधी समाचार पत्रांे की सप्लाई रोकने से लेकर प्रतियां फूंकते थे। एक बार फिर सरकार उसी दिशा में बढ़ती दिख रही है। सुखद बात यह है कि पार्टी कार्यकर्ताओं ने अखबारों के खिलाफ हल्ला नहीं बोला है। मुलायम सिंह के समय में भी अखबार मालिकों और सरकार के बीच समझौता हुआ था। उसी घटनाक्रम की पुनरावृत्ति उत्तराखंड में होती नजर आ रही है तो फिर समझौते की संभावना को कैसे खारिज किया जा सकता है! विज्ञापन रूपी ऐसा अचूक शस्त्र सरकार के हाथों में होता है जिसकी मार के डर से अखबारों के मालिक और प्रबन्धक सरकार के सम्मुख नतमस्तक होने को विवश हो जाते हैं। 
सरकार की नीतियां ऐसी हो चुकी हैं कि जेब से पैसा खर्च करके कोई अखबार निकालने का जोखिम नहीं उठा सकता।     

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