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मीडियाःशोषण के पथ पर कैरियर का सपना !

03-01-2018 20:59:16 पब्लिश - एडमिन



देश और समाज का अभिन्न अंग बन चुके मीडिया जिसे समाज और व्यवस्था को आईना दिखाने का सर्वाधिक सशक्त माध्यम समझा जाता है वह भी बाजारवाद की आंधी में कमाई का अडडा बनता जा रहा है। नित नये खुलने वाले अखबार और चैनल आंखों में मीडिया जगत में कैरियर बनाने का सपना लेकर आने वाले युवाओं के शोषण का केन्द्र बन गये हैं। सुनहरे भविष्य का सपना दिखाकर उनसे कोल्हू के बैल की तरह काम लिया जाता है। मतलब हल होते ही बिना सैलरी दिये बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है। नित दिन पत्रकारों के शोषण के समाचार आते रहते हैं। व्यवस्थाओं की खामियों और भ्रष्टाचार को उजागर करने के लिए जान जोखिम में डालकर पत्रकारिता करने वाले युवा मीडियाकर्मियों का शोषण मीडिया जगत का शगल बन चुका है।
सुनहरे भविष्य का सपना लेकर मीडिया जगत में प्रवेश करने वाले युवा जर्नलिस्ट चाहे वह अखबार में काम करे या चैनल में उनसे कोल्हू के बैल की तरह काम करने के बावजूद जब बिना वेतन दिये संस्थान से बाहर किये जाते है तब भी वह अपनी पीडा को नजर अन्दाज कर यह सोचकर अन्य मीडिया का संस्थान का रूख करते हैं कि शायद नई जगह उनके परिश्रम और प्रतिभा का सही मूल्यांकन हो किन्तु कुछ महीनांे के बाद वहां भी उनका सपना टूटने लगता है। अखबार और चैनल के मैनेजमेंट में बैठे लोग और स्थापित हो चुके पत्रकार और एडिटर भी प्रतिभाशाली पत्रकार को ज्यादा दिनों तक टिकने नहीं देते। प्रतिभाशाली पत्रकार/एडिटर की योग्यता अजगर की तरह कुंडली मारे बैठे लोगों को अपने भविष्य के लिए खतरा नजर आने लगती है। नतीजतन उन पर वर्कलोड इतना बढा दिया जाता है कि वह या तो खुद परेशान होकर भाग जाते हैं अथवा वेतन भत्ता बढ़ाने की डिमांड करने लगते हैं, बस उसी वक्त उन्हें निकाल बाहर किया जाता है। अखबार और चैनल स्वामी घाटे में होने का बहाना बनाकर वेतन वृद्धि से किनारा कर लेतेहै। क्या यह हैरत की बात नहीं कि एक ओर जहां इलेक्ट्रोनिक मीडिया में एफडीआई में तेजी से वृद्धि दर्ज की जा रही है वही स्थापित चैनलों से जाने माने एंकर और सीनियर जर्नलिस्ट को बाहर किया जा रहा है। उनके कान्टेªक्ट में बदलाव कर सैलरी में कटौती की जा रही है। 
हाल ही में एक युवा पत्रकार ने अपनी पीड़ा को अभिव्यक्त किया। युवा पत्रकार ने अपनी पोस्ट में मजदूर की तरह काम कराये जाने के बावजूद वेतन न देने की मुख्य पीड़ा थी। यह अकेले उस पत्रकार की पीड़ा नहीं है बल्कि मीडिया में सुखद और बेहतरीन भविष्य बनाने का सपना लेकर आने वाले अधिकांश युवा पत्रकारों की पीड़ा है।नया साल चुनावी साल है हमेशा की तरह इस चुनावी सीजन में कुकुरमुत्तों की तरह समाचार पत्र और चैनल सामने आयेंगे और मास कम्युनिकेशन कर चुके युवा पत्रकारों को उज्जवल भविष्य बनाने का आश्वासन देकर उन्हें रात दिन दौड़ायेगे किन्तु चुनाव खत्म होते ही घाटा होने का बहाना बनाकर चलते बनेंगे। यह नजारा आये दिन देखने में आता है। पत्रकारिता में कैरियर बनाने आये पत्रकारों को सोच समझकर ऐसे मीडिया संस्थानों में काम करने के रिस्क से बचना होगा वर्ना देर सवेर उन्हें भी वेतन आदि न मिलने की पीडा मन में लेकर विदा होना होगा।
समाज के अन्य क्षेत्रों की तरह मीडिया में भी अच्छे बुरे दोनों किस्म के लोगों की कमी नहीं। आज भी ऐसे सीनियर्स हैं जो युवाओं की प्रतिभा को निखारते है लेकिन ऐसे लोग मालिकों की नजरों में खटकने लगते हैं। मालिकों को लगने लगता है कि कहीं फला सीनियर जूनियर के बूते लाॅबी न बना ले जो मालिकों के लिए चुनौती बन जाये। युवा पत्रकारों को सोच समझकर मीडिया खासकर न्यूज चैनल की दुनिया में आना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह किसी चैनल के लिए बिकाउ प्रोडक्ट की तरह इस्तेमाल होकर रह जाये। मीडिया क्षेत्र में चालाक किस्म के मालिक और प्रबन्धक युवा पत्रकारों की प्रतिभा का दोहन करने के लिए उन्हें अपनेपन का एहसास कराने के लिए संस्थान को परिवार की संज्ञा देकर भावनात्मक शोषण करने से भी परहेज नहीं करते। बार बार अहसास कराया जाता है कि संस्थान एक परिवार की तरह है जिसे मजबूत करना सामूहिक दायित्व है। संस्थान यानि परिवार मजबूत होगा तो सबको लाभ होगा। आमतौर पर युवा पत्रकार इस भावनात्मक झांसे में आकर रात दिन परिश्रम कर संस्थान को लाभान्वित करने में जुट जाते हैं लेेेकिन बात जब लाभांश मांगने की आती है तो बाहर का रास्ता दिखाने में तनिक भी विलम्ब नहीं किया जाता।
2018 में कई राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं। आप देखेंगे कि उन राज्यों में नये नये अखबार और चैनल खुलेगे। युवाओं के परिश्रम के बूते मीडिया संस्थान प्रत्यक्ष परोक्ष पैसा बनायेंगे और चलते बनेंगे। विभिन्न कालेजों से पत्रकारिता का कोर्स करके निकले युवा पत्रकार/एडिटरों और फोटोग्राफरों सहित अन्य लोग इनका टारगेट बनेगे। ऐसे युवा भी सुनहरे भविष्य का सपना साकार करने के लिए कुकुरमुत्तांे की तरह उगे मीडिया संस्थानों का हिस्सा बन जायेंगे। देश में ऐसे युवाओं की भारी संख्या है जो कैरियर के लिए कोल्हू का बैल भी बनने को तैयार रहते हैं। युवाओं की यही फौज ऐसे मीडिया संस्थानों के लिए वरदान साबित होती है। युवाओं के लिए किसी भी चैनल में काम करके अनुभव हासिल करने का मौका उनके शोषण का जरिया न बन जाये इस बात को उन्हें खास ध्यान रखना होगा। जर्नलिज्म बेशक समाज में व्याप्त बुराईयों, व्यवस्था में जड़े जमा चुके भ्रष्टाचार और सरकारी गैर सरकारी संस्थानों/विभागों की काली करतूतों का पर्दाफाश करने का सर्वाधिक सशक्त और सुलभ माध्यम है किन्तु जब युवाओं का कार्यस्थल ही इन तमाम खामियों से भरा हो तो जरूरत सोच समझकर फैसला लेने की होती है। रिर्पोटिंग में कैरियर बनाये या ग्राफिक्स डिजाइनिंग में अथवा स्क्रिप्ट और विजुअल राइटिंग या फोटो जर्नलिज्म में बेशक यह क्षेत्र अपार संभावनाओं से भरा है किन्तु सही संस्थान का चयन करना आपके विवेक पर निर्भर करता है। चाणक्य ने कहा है कि ‘‘ जिस जगह प्रतिभा और योग्यता की कद्र न हो वह जगह छोड़ देनी चाहिए क्योंकि उसका पतन सुनिश्चित है।’ जगह का तात्पर्य शहर/संस्थान से है।
नया साल जर्नलिज्म के नये लोगों के लिए शुभ हो, यही मंगल कामना है।
 

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