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दूसरों के हक की आवाज बुलन्द करने वाला पत्रकार अपने हक से महरूम

29-01-2018 19:23:19 पब्लिश - एडमिन


इंदौर के एक अखबार ने अपने की तीन पत्रकारों की तस्वीरों सहित उन्हें दलाल करार देकर उनके खिलाफ खबर छापकर पत्रकारों को नीचा दिखाया या खुद अपनी प्रतिष्ठा को पलीता लगाया यह सोचने का विषय नहीं है। सीधी सी बात है कि जब जब अपने हक के लिए आवाज बुलन्द की जाती है तो नपत्रकार क्या समाज के किसी वर्ग का कामगार हो उसे अलग अलग तौर तरीके अपनाकर या तो दबाने की कोशिश की जाती है या फिर शोषण औरे उत्पीड़न में इजाफा कर दिया जाता है। देश में किसानों का वाजिब मूल्य लेकर किये जाने वाले आन्दोलन हो या कारखानों में जमकर पसीना बहाने वाले मजदूर हो जब जब कोई हक के लिए आवाज उठाता है तो उसे  मालिकान का कोपभाजन बनना होता है। यह सिलिसिला बरसों से चला रहा है और संभवतः चलता रहेगा।
आम तौर पर मीडिया और राजनीति में चोली दामन का साथ रहा है। दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के महत्वपूर्ण स्तम्भ माने जाते हैं लेकिन विडम्बना यह है कि जब जनप्रतिनिधियों के वेतन और भत्ते आदि में इजाफे की मांग उठती है तो ध्वतिमत से आनन फानन में प्रस्ताव पारित हो जाता है जबकि मीडिया जगत में ठीक इसके उलट होता है। वेतन में बढ़ोतरी के लिए आवाज उठते ही पत्रकार /सम्पादक/डेस्क इंजार्च की विदाई की पटकथा लिखे जाने की तैयारी शुरू हो जाती है। बेरोजगारी का आलम यह है कि अगर कोई दस हजार रूपये की नौकरी को छोड़े तो सात से आठ हजार रूपये तक काम करने वाले तैयार मिलते हैं बल्कि अब तो ऐसे ऐसे लोग मीडिया में आ गये हैं कि उन्हें चैनल की आईडी या अखबार का परिचय पत्र मिल जाये तो वह मालिकों से लेने के बजाय उन्हें देने लगते हैं। यहीवजह है कि अधिकांश क्षेत्रीय चैनल अपने संवाददाता को आईडी देते समय उससे पैकेज तय करते हैं कि वह कितने रूपये महीना देगा। साक्षात्कार महज खानापूर्ति होती है, असली मकसद पैकेज तय करना होता है। यही परिपाटी अखबारों में भी चल निकली है। शहर और तहसील स्तर पर नियुक्त होने वाले प्रभारियों को साल भर का विज्ञापन टारगेट दिया जाता है। खरा नहीं उतरता उसका ट्रांसफर कर दिया जाता है। अखबार मालिक और मैनेजमेंट में बैठे लोग अच्छे पत्रकार के बजाय टारगेट पूरा करने में सक्षम पत्रकारों को तवज्जो देते हैं।
आमतौर पर लघु एवं मध्यम वर्ग के अखबारों में वेतन के नाम पर छोटी मोटी राशि मानदेय के रूप में दे दी जाती है। मीडिया के जरिये अपनी छवि बनाने में हमेशा आगे रहने वाले जन प्रतिनिधियों ने कभी सदन के भीतर मीडियाकर्मियों को समुचित वेतन के मुददे पर अपने वेतन भत्ते में बढ़ोतरी का प्रस्ताव पारित करने जैसी अभूतपूर्व एकता कभी प्रकट नहीं की। समाज के अन्य कामगारों की तरह मीडियाकर्मियों को उत्पीड़न भी एक मुददे के सिवा कुछ नहीं। एक उलझी इुई समस्या या एक अनुत्तरित प्रश्न! जो भी हो लेकिन अपने वेतन भत्तों को लेकर सदैवे सजग रहने वाले जनप्रतिनिधि कभी मीडियाकर्मियों के हित में उतने गम्भीर नहीं होते जिसकी जरूरत होती है जबकि मीडियाकर्मी भी उसी समाज का एक अंग है जिसे समाज अपने जन प्रतिनिधित्व के रूप में चुनकर अपने हितों की रक्षा की उम्मीद में संसद या विधानसभा में भेजता है। मौजूदा पत्रकारिता का स्वरूप बिल्कुल बदल चुका है। हाल ही में एक अखबार के सुधी पाठक ने बिहार/झारखंड के लोकप्रिय अखबार के सम्पादक की निष्पक्षता के साथ साथ अखबार की विश्वसनीयता को लेकर ज्वलन्त प्रश्न उठाते हुए पत्र लिखा है जो खासा चर्चा का विषय बना हुआ है। इस अखबार का शुमार टाप हिन्दी में होता है। 
बहरहाल बात मध्य प्रदेश के किसी अखबार की हो या बिहार/झारखंड/राजस्थान और महाराष्ट्र सहित किसी अन्य राज्य के पत्रकार की, उसके उत्पीडन के खिलाफ समाज के किसी वर्ग से समर्थन की पहल नहीं होती। किसी औद्योगिक इकाई के श्रमिक हड़ताल कर दे तो उनकी हड़ताल को समर्थन के मुददे पर अलग अलग राजनीतिक दलों में होड़ मच जाती है किन्तु पत्रकारों को जब मालिक और मैनेजमेंट बाहर का रास्ता दिखाता है तो कोई विधायक या सांसद उसके शोषण के खिलाफ कुछ नहीं बोलता और अगर बोलता है तो इतना संतुलित ताकि अखबार के मालिक और प्रबन्धक नाराज न हो। यही वजह है कि सत्ता का चाटुकार बना बिहार-झारखंड का लोकप्रिय अखबार या फिर इंदौर के गुटखा किंग का अखबार सबका अपना अपना नजरिया अपने अपने हित हैं। सम्पादक महोदय से मंत्री से बातचीत होने के बाद अपने संवाददाता की रिपोर्ट को रोक देते हैं। यहां तक कि अखबार के कर्मचारी की पिटाई के समाचार को जगह नहीं मिलती। इसलिए पिटाई करने वाले सत्तारूढ़ पार्टी का पूर्व विधायक है। लोकतंत्र के चैथे खम्भे को सरेआम सड़क पर लिटा लिटाकर पीटा जाता है लेकिन जिस अख्बार के लिए वह पिटता है वही अखबार उसकी पिटाई की खबर को नहीं छपता तो समझा जा सकता है कि पत्रकारिता किस तरफ जा रही है।
दुनिया भर में मीडिया क्षेत्र में भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता दिन प्रतिदिन गिरती जा रही है तो इसकी जिम्मेदारी खुद मीडिया की है। मीडिया का सत्ता की चैखट समर्पण करना मिशन पत्रकारिता की गरिमा को तार ता कर रहा है लेकिन पूरी तरह कारोबारी रंग में रंग चुके मीडिया को अपनी छवि और विश्वसनीयता के बजाय मुनाफे की चिन्ता है। शहरों में काम करते मीडियाकर्मियों को कूपन बेचने तक के धंधे में लगा दिया जाता है। इस विट परिस्थिति में मीडिया से निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद करना व्यर्थ है। मालिकों की दबंगई कहे या सत्ता प्रतिष्ठान की बेबसी की कि मीडियाकर्मी अपने जायज हक से महरूम है। देश की सबसे बड़ी अदालत मीडियाकर्मियों के हित में मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने का फैसला सुना चुकी है लेकिन न तो केन्द्र सरकार और न किसी राज्य की सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के अनुपालन की दिशा में कोई सार्थक कदम उठाया है। सर्वोच्च न्यायालय मजीठिया वेज बोर्ड केस की सुनवाई के दौरान आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों के लेबर आयुक्तों को फटकार लगा चुका है लेकिन स्थिति जस की तस है। ऐसे में अपने ही पत्रकारों को दलाल कहने वाला अखबार हो या अपने ीि छायाकार की पिटाई का समाचार रददी की टोकरी में फेंकने वाला नामचीन अखबार इस हमाम में दोनों नंगे है।
मजीठिया वेज बोर्ड के सन्दर्भ मंें आये फैसले के बाद देश के मीडिया घरानों में हलचल तो मची है लेकिन सरकारों की उदासीनता के चलते उनकी हनक बरकरार है। यही कारण है कि मिशन पत्रकारों की मुश्किले कम नहीं हो रही है। वोटबैंक के मददेनजर आनन-फानन विधेयक और अध्यादेश लाने वाली सरकारें मीडियाकर्मियों को उनका वाजिब हक दिलाने को लेकर क्यों गम्भीर नहीं, इस बारे में कुछ न कहा जाये तो बेहतर होगा। ‘क्योंकि यह पब्लिक है सब जानती है!’
संजय कश्यप (एडिटर आक्रोश4मीडिया)
 

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