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हिन्दी पत्रकारिता के पुरोधा डा. त्रिखा नहीं रहे

17-01-2018 12:06:31 पब्लिश - एडमिन


दैनिक नवभारत टाठम्स के पूर्व स्थानीय सम्पादक और नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष नंद किशोर त्रिखा का उपचार के दौरान नई दिल्ली के एम्स में निधन हो गया। देश के कई नामचीन विश्वविद्यालयों में जर्नलिज्म के गेस्ट प्रोफेसर के रूप में काम कर चुके डा. त्रिखा ने लंदन क थामसन फाउंडेशन की फेलोशिप पर उच्च पत्रकारिता में डिप्लोमा किया था। डा. त्रिखा को संसदीय और संविधान से सम्बन्धित पत्रकारिता को महान ज्ञाता समझा जाता था। बतौर पत्रकार डा. त्रिखा ने पूरे देश और कई अन्य देशों को भ्रमण किया तथा अनेक साहित्यक और पत्रकारिता से सम्बन्धित पुरुस्कार प्राप्त किये। वह अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित भी किये गये। अपने पत्रकारिता जीवन में उन्होंने हिन्दुस्थान समाचार के काठामांडू, उड़ीसा और दिल्ली में ब्यूरो प्रमुख के रूप में भी काम किया। देश विदेश की विभिन्न ज्वलन्त समस्याओं पर लिखने में उन्हें महारत हासिल थी। उनके लेख, रिपोर्ताज और सम्पादकीय, टिप्पणियां और स्तम्भों को हिन्दी के पाठक सुरूचिपूर्वक पढ़ते थे। पत्रकारिता की हर विधा उनकी लेखनी से अछूती नहीं रही।
डा. त्रिखा ने 1963 में देश के लोकप्रिय अखबारों में शुमार दैनिक नवभारत टाइम्स में विशेष संवाददाता और वरिष्ठ सहायक सम्पादक, राजनयिक प्रतिनिधि और स्थानीय सम्पादक के रूप में अपने दायित्वों को बखूबी अन्जाम दिया। देश के नामचीन पत्रकारों में शुमार डा. त्रिखा को कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त हुए। देश के प्रख्यात माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय में लम्बे समय तक अध्यापन की जिम्मेदारी संभालने वाले डा. त्रिखा ने अपने समय में बेहतरीन पत्रकारों की एक लम्बी चौड़ी जमात पैदा की। वह नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट (एनयूजेआई) के दो बार अध्यक्ष और महासचिव भी रहे। उन्हें प्रेस काउंसिल आफ इंडिया के सदस्य के साथ ही पत्रकार व गैर पत्रकार समाचार पत्रों कर्मियों के लिए गठित वेतन आयोग के सदस्य भी रहे। डा. त्रिखा ने बीएससी/एम.ए.जे.डी (यूके) और पी.एच.डी की उपाधि भी प्राप्त की। लगभग 32 वर्षीय पत्रकारिता जीवन गुजारने वाले डा. त्रिखा बाद में माखनलाल पत्रकारिता विवि से जुडे और पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष और वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में काम करते रहे। उनके निधन को हिन्दी पत्रकारिता जगत की अपूरणीय क्षति के रूप में देखा जा रहा है। डा. त्रिखा की सबसे बड़ी खूबी यही है कि उन्हें जो भी काम किया उसमें अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। उनके अनेक शिष्य आज पत्रकारिता क्षेत्र में अग्रणीय नाम बन चुके है। डा. त्रिखा का जीवन हमेशा पत्रकारिता को समर्पित रहा। 


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