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श्रीदेवी कवरेजः पूर्व सम्पादकों पर बरसे सरदाना ने

08-03-2018 14:59:15 पब्लिश - एडमिन


नई दिल्ली। मशहूर सिने तारिका श्रीदेवी की मौत के कवरेज के दौरान बरती गयी मीडिया की भूमिका पर तीखी बहस में अब मशहूर पत्रकार और एंकर भी कूद गये हैं। रोहित सरदाना ने वरिष्ठ पत्रकारांे खासकर रिटायर्ड संपादकों पर निशाना साधते हुए कहा कि जो लोग यह कहते हैं कि श्रीदेवी की मौत के मामले में न्यूज मर गई, सरासर गलत कहते हैं। अपनी फेसबुक वाल पर रोहित सरदाना ने सिलसिलेवार हर सवाल का जवाब दिया है।
तल्ख तेवरों के साथ रोहित सरदाना लिखते हैं बल्कि न्यूज  की मौत पर बवंडर मचाने वालों को आडे हाथों लेते हुए लिखते हैं किः-’’बहुत लोगों को डर था कि श्रीदेवी की मौत की कवरेज में नीरव मोदी को भुला दिया जायेगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। भारतीय मीडिया कीर्ति चिदम्बरम को भी नहीं भूला! थ्बहार के मुजफ्फरपुर में नौ बच्चों पर गाड़ी चढाने वाले आरोपी चालक मनोज बैठा को भी मीडिया नहीं भूला, भले ही लगातार श्रीेदवी पर खबरें चल रही थी। इसलिए अगर कोई यह कहे कि श्रीदेवी की मौत के कवरेज के दौरान न्यूज की मौत हो गयी थी तो वह उससे सहमत नहीं है। दिलचस्प यह है कि जब तक आप नौकरी पर रहे, वही सब करते रहे लेकिन नौकरी जाते ही आपको लगने लगे कि आपके अलावा जितने लोग काम कर रहे है। व न्यूज की हत्या करने लगे हैं तो ऐसे में कुछ सवाल पूछना जरूरी हो जाता है।
रोहित साफगोई से लिखते हैं किः-‘‘यदि किसी फिल्म स्टार की मौत देश से हजारों किमी दूर असामान्य परिस्थितियों में हुई है, जिसकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने में दो दिन लग जाते हैं, जिसके बारे में डैथ सार्टिफिकेट साफ तौर पर कुछ नहीं बता पाता, जिससे जुड़ी खबरें छन-छन कर विदेशी मीडिया के सहारे बाहर आ रही हैं, लेकिन जिसके बारे में आपके देश की आबादी का बड़ा हिस्सा जानना चाहता है, उसे कैसे नजर अन्दाज किया जा सकता है!’’ बकौल रोहित सरदानाः-‘‘ किसी ने लिखा कि श्रीदेवी एक पीढ़ी के लिए चांदनी थी, तो एक पीढ़ी ने माॅम के जरिये उनसे रिश्ता जोडा था। उनकी मौत के बार में हर कोई जानना चाहता था क्योंकि भारतीय सिनेमा के चाहने वालों के दिलों में श्रीदेवी की अपनी जगह थी। ऐसे में मीडिया ने हर गली-मौहल्ले, नुक्कड़-चैराहे और चाय-पान की गुमटी तथा दफ्तर, रेल-बस में हो रही चर्चाओं को देखते हुए श्रीदेवी की मौत का कवरेज चार दिन चला दिया तो क्या अपराध किया!’’
एक के बाद एक उदाहरण देते हुए रोहित सरदाना लिखते हैं कि सलमान खान के हिरण केस का टीवी ट्रायल किसी को याद है कि कितने दिल चला था? सलमान खान के ही हिरण शिकार मामले की पेशियों को कितना कवरेज मिलेगा, यह तय करने वाले ज्यादातर टीवी एडिटर अब रिटायर हो गये होंगे, लेकिन अपने समय में उन्होंने कौन सी सीमाएं तय की थी? संजय दत्त की पेशियों के समय क्या किसी टीवी चैनल को यह याद रहता था कि कोई और खबर भी चलनी है?’’ रोहित सरदाना के तल्ख तेवरों से होटल से बरादम पूर्व विदेशमंत्री शशि थरूर की पत्नी सुंनदा पुष्कर का मामला भी अछूता नहीं रह पाया। उन्होंने खुलकर लिखाः-’’सुंनदा पुष्कर का शव होटल के कमरे से ऐसी ही रहस्यमय परिस्थितियों में मिलाथा, कितने दिन तक कवरेज चली थी, याद है किसी को? आरुषि केस महीनों तक टीवी पर चलता रहा था, क्योंकि हर मां-बाप, हर बच्चा उस केस से खुदको जुड़ा महसूस करता था। निठारी में मासूम के कातिलों की कहानी हफ्तों तक टीवी पर छाई रही थी। हाल ही में गुडगांव के रेयान पब्लिक स्कूल के छात्र प्रद्युम्न मर्डर केस भी कितने दिनों तक टीवी चलता रहा, तो किसी को नहीं चुभा? सिर्फ सितारे ही नहीं बल्कि भारत के टीवी चैनल्स ने तो मेरठ की गुडिया की शादी की कहानी को हफ्ते भर चैबीस घंटे तक दिखाया था। माॅडल निकाहनामे की वजह बनी इमराना की कहानी के दौरान बाकायदा टीवी पर पंचायते बैठी थीं, और घंटों घंटों तक चर्चाएं होती रही थीं। प्रिंस नामक बच्चा गड्ढे में गिर गया था, 72 घंटे लगातार टीवी कैमरे खड़े रहे थे तो बच्चा जिन्दा निकाला जा सका था, किसी को याद है?’’
टीआरपी को लेकर हायतौबा मचाने वालों को निशाना बनाते हुए रोहित सरदाना लिखते हैं किः-’’सबसे आसान होता है ये कह देना कि टीआरपी के लिए कर रहे हैं ये तो! ज्बकि न तो कोई टीवी सम्पादक आज तक टीआरपी का कोई श्योर शाॅट कट फार्मूला निकाल पाया और न ही कोई टीवी आलोचक इसकी तह तक पहुंच पाया कि किस खबर की टीआरपी आती है, किसकी नहीं! टाप जन सरोकारों की अच्छी खबर चला लीजिये, कोई भरोसा नहीं कि लोग उसे देखें या नहीं। इस तरह के दावे करने वाले कितने चैनल्स और उनकी क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं है। तीन दशक पूर्व फिल्म ‘‘कुली’’ की शूटिंग के दौरान अमिताभ बच्चन को चोट लग गई थी। तब न टीवी था, न 24 घंटों तक चलने वाला चैनल लेकिन रेडियो और अखबार में ही कोहराम मच गया था। हर आदमी जानना चाहता था कि क्या हुआ, और अखबारों ने उस खबर को प्रमुखता दी भी। तब कौन सी टीआरपी गिनी जा रही थी?’’
न्यूज की मौत का राग अलापने वाले दिग्गज पत्रकारों से रोहित सरदाना सवाल करते हैं किः-‘‘मुम्बई पर 26/11 के आतंकी हमले की कवरेज के दौरान न रिपोटर्स ने रात दिन देखा और न टीवी चैनल्स ने। मसला देश की सुरक्षा का था। उसी दौरान पूर्व पीएम वी.पी. सिंह चल बसे थे लेकिन कवरेज हमले को ही मिली। जो आज पूछ रहे हैं कि जज लोया की मौत पर कवरेज क्यों नहीं किया श्रीदेवी पर ही क्यों किया, वही उस समय पूछते थे कि वीपी सिंह पर पर कवरेज क्यों नहीं किया, फाइव स्टार होटल पर हमले का कवरेेज क्यों किया? क्योंकि मामला सिर्फ एक पांच सितारा होटल पर हमले का नहीं था बल्कि भारत की संप्रभुत्ता पर हमले का था। सवाल तब भी उठे थे, सवाल आज भी उठ रहे हैं। कवरेज कीजिए बाथटब क्यों दिखा रहे है? क्या इस देश का हर आदमी जानता है कि बाथटक क्या है? सबके घरों में बाथटब बने हैं? किसी के मन में ये सवाल नहीं आयेगा कि बाथटब में भला कैसे मौत हो सकती है? ऐसे में बाथटब दिखाना अपराध कैसे हो गया? या कि खुद को होली काउ दिखाने के लिए जरूरी है कि दूसरे जो कर रहे हैं उसे न्यूज की मौत करार दे दिया जाए और अपने सारे कर्मकांडों पर पर्दा डाल दिया जाये।’’
रोहित सरदाना का आक्रोश यही नहीं थमता बल्कि वह और आगे जाते हैं और पूछते हैंः-‘‘न्यूज की मौत उस दिन नहीं हुई थी क्या जिस रोड मीडिया रिपोर्टिंग के चक्कर में देश के एक जवान फौजी अफसर ने जान गंवा दी थी? न्यूज की मौत उस दिन नहीं हुई थी जिस रोज नामी पत्रकारा कारपोरेट लाॅबिस्ट नीरा राडिया के साथ मिलकर मंत्रिमंडल के नाम तय करने का दावा कर रही थी? न्यूज की मौत उस दिन नहीं हुई थी जब एक टीवी चैनल पर रिपोर्टिंग की आड में देश की सुरक्षा को खतरे में डालने के लिए बैन का फैसला हो गया था? न्यूज की मौत उस दिन नहीं हुई थी जिस दिन पालिटिकल पार्टी के प्रवक्ता बन चुके एक पत्रकार एक निजी कम्पनी के पक्ष में लेख लिखना पकड़ा गया था? न्यूज की मौत उस दिन नहीं हुई थी जिस दिन सचा दिखाने का दावा करने वाले चैनल पर पत्रकार की पत्नी के जरिये रिश्वत देकर घोटाले का केस सेटल करने की कोशिश करने का मामला उजागर हुआ था?’’
रोहित सरदाना अन्त में बहुत ही बेबाक अन्दाज में सवाल करते हैं किः-‘‘ सरकारी अफसर तो चलिए समझ में आता है कि रिटायर होने के बाद  वर्ना ट्रांसफर-पोस्टिग और सीआर बिगड़ने का खौफ रहता है, पत्रकार बड़े निष्पक्ष कहे जाते हैं न?  फिर सम्पादक की कुर्सी पर बैठते रहते समय न्यूज की मौत से काहे पल्ला झाड़ लेते हैं?’’ या रिटायरमेंट के बाद उंगली कटकार शहीद का दर्जा चाहिए?’’
(साभारः-रोहित सरदाना की फेसबुक वाल से)


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