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कब बहुरेंगे शोषित मीडियाकर्मियों के दिन !

23-01-2018 19:20:18 पब्लिश - एडमिन



न्यूज वन इंडिया पर माला लग गया। मैनेजमेंट के एक लाईन के फैसले से चैनल को सेवा देने वाले मीडियाकर्मी सड़क पर आ गये। चमकदार कैरियर का सपना लेकर कुछ नया कर दिखाने का जज्बा और हौंसला लेकर माॅस कम्युनिकेशन कोर्स कर चैनलों को ज्वाइन करने वाले युवा मीडियाकर्मियों का इस तरह अचानक सड़कों पर आना कोई पहली घटना नहीं है। मीडिया के ग्लैमरस की चकाचैंध में समय समय पर खबरिया चैनलों का आगाज होता है। धमाकेदार ढंग से एन्ट्री दर्ज करायी जाती है लेकिन वक्त के साथ साथ काम की चुनौतियां चैनल संचालकों को समस्याओं के द्वार पर ले जाकर खड़ा कर देतीहै। इनमें मुख्य और सबसे बड़ी समस्या पंूजी की होती है। कोई भी पंूजीपति आमदनी के मोह में ही मीडिया क्षेत्र में इन्वेस्ट कर अखबार या चैनल शुरू करता है लेकिन मीडिया में दिग्गज और स्थापित मीडिया ग्रुप्स की लाबिंग के चलते उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाते तो हौंसला टूटने लगता है और एक दिन वही अन्जाम होता है जो न्यूज वन इंडिया का हुआ और इससे पूर्व भी कई चैनलों के साथ हो चुका है।
आक्रोश मीडिया में समय समय पर चैनलों और अखबारों में कार्यरत मीडियाकर्मियों की पीड़ाओं से सम्बन्धित समाचार प्रकाशित होते रहते हैं। नामचीन चैेनलों से वेतन न मिलने के कारण मीडियाकर्मियों के चैनल से विदा होने के समाचार आते रहते हैं। मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करने के सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बाद मीडिया समूहों में बौखलाहट नजर आ रही है। बड़े बड़े समूह मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों से बचने की कोशिशों में लगे हुए हैं। देश के जाने माने वकील उनके बचाव में कोर्ट में खड़े हो चुके हैं लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने बचाव पक्ष के अधिवक्ताओं की तमाम दलीलों को दरगुजर करते हुए दो टूक फैसला सुना दिया है कि उन्हें मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करनी ही होंगी। कुछ न लागू कर दी है तो कुछ ने आंशिक रूप से लागू की है। बाकी अब भी बचाव का रास्ता तलाशने में लगे हुए हैं।
घोर आश्चर्य की बात है कि बड़े बड़े मीडिया ग्रुप्स और औद्योगिक घरानों के सरंक्षण में संचालित होने वाले अखबार घाटे का रोना रोकर मीडियाकर्मियों को समुचित वेतन-भत्ते और सुविधाएं नहीं देने से कतराते हैं लेकिन उनकी तिजोरी का वजन कम नहीं होता। अखबार चलाकर मिले खड़ी कर ली जाती है। करोड़ों की ठेकेदारी का रास्ता निकालकर तिजोरी भरी जाती है, यह सब अखबार के रूतबे से संभव होता है लेकिन बात जब उसी अखबार को कामयाबी के शिखर पर पहुंचाने वाले स्टाफ को समुचित वेतन की आती है तो मालिक बगले झांकने लगते हैं। परन्तु इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दियाहै कि अखबार मालिकों को मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशें लागू करनी ही होगी। न्यायपालिका कहे सख्त रूख के बाद पहली बार ऐसा लग रहा है कि मीडिया ग्रुप्स दबाव में हैं। अतीत में मणिसाणा और बछावत आयोग की सिफारिशों पर भी काफी हो हल्ला हुआ था लेकिन तब इतना शोर नहीं था। कोर्ट की सख्ती से कई पत्रकार खुलकर सामने आये हैं। उन्हें कामयाबी भी मिली है लेकिन सवाल यह है कि सरकारें क्या कर रही है? सरकारे न्यायपालिका के फैसले लागू कराने में क्यों बेबस नजर आ रही है!
वोटबैंक से प्रेरित राजनीति के मुददों पर आनन फानन में अध्यादेश लाने वाली सरकार आखिर ऐसा अध्यादेश लागू करने में क्यों कन्नी काट रही है कि मजीठिया वेज बोर्ड की सिफारिशों के अनुकूल वेतन भत्ते न देने वाले अखबारों को सरकारी विज्ञापन नहीं दिये जायेंगे। न्यायपालिका के फैसले को लागू करने से बचने वालों पर सरकार मेहरबान क्यों है?
सामाजिक सरोकारों से दुनिया को रूबरू कराने वाले मीडियाकर्मियों के सामाजिक सरोकारों से सरकर कब तक आंखें मूंदे रहेगी? इस सवाल का जवाब आज हर मीडियाकर्मी चाहता है लेकिन जवाब किसी के पास नहीं है! 
4 किसान को टेªक्टर से कुचलकर मार डाला रिकवरी एजेंट ने
कर्ज में डूबे किसान की आत्महत्या की खबरे तो आये दिन सुर्खियां बनती रहती हैं लेकिन अब कर्ज के लिए किसान की हत्या करने का सनसनीखेज मामला सामने आने से सरकार के किसान हितैषी होने के दावों की हकीकत का पर्दाफाश हो गया है। एक रिकवरी एजेंट ने रिकवरी के लिए किसान की उसी के टेªक्टर से कुचलकर हत्या कर दी और टेªक्टर लेकर फरार हो गया। मामला सीतापुर का है।
‘‘जय जवान जय किसान’’ का नारा महज नारे के सिवा और क्या है! देश की राजनीति का केन्द्र बिन्दु रहे किसानों की दयनीय हालत का नमूना आये दिन किसानों की आत्महत्या के रूप में देखा जा सकता है। देश के सभी दलों के नेता खुद को किसान हितैषी साबित करने का कोई मौका नहीं चूकते लेकिन तमाम दलों के शासन में किसान आत्महत्या को मजबूर हैं। चाहे वह विकास का माडल कहे जाना वाला गुजरात ही क्यों न हो या अपने इकबाल का झंडा बुलन्द करने वाले यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का यूपी ही हो जहां सीतापुर में जहां 65 हजार रूपये की रिकवरी के लिए गये एजेंट ने रूपया न मिलने पर किसान ज्ञानचंद को उसी के टेªक्टर से कुचलकर मार डाला। ज्ञानचंद कर्ज अदायगी के लिए दूसरे का खेत जोत रहा था। ज्ञानचंद ने टेªक्टर खरीद के लिए पांच लाख रूपये का लोन लिया था। वह बदस्तूर कर्ज चुकाता आ रहा था। उस पर 65 हजार रूपये का बकाया था जिसे वसूलने के लिए गये रिकवरी एजेंट ने पैसा न मिलने पर गुस्से में आग बबूला होकर किसान का टेªक्टर कब्जा लिया और विरोध करते किसान पर चढ़ा दिया। किसान ज्ञानचंद की हडिडया चकनाचूर हो गयी और उसने मौके पर ही दम तोड़ दिया। घटना के बाद रिकवरी एजेंट टेªक्टर लेकर फरार हो गया।
जाने माने पत्रकार रविश कुमार ने अपनी एफबी वाल पर इस दर्दनाक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि पत्रकार कमाल खान की रिपोर्ट से वह अन्दर तक हिल गये हैं। रविश पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि-‘आईये किसानों के लिए कुछ देर मौन रहते हैं। कितना बोलंेगे! किसी को फर्क नहीं पड़ता। किसान सिर्फ ‘जय जवान जय किसान’ के नारे के लिए याद आता है। इस नारे ने किसानों को मरवा दिया।’
 किसानों को कर्ज से निजात दिलाने और उनकी आमदनी को दोगुना करने के सरकार के दावों और जमीनी हकहकत के बीच कितना फर्क है उसका जीता जागता सबूत यूपी के सीमापुर में उस समय सामने आया जब किसान से कर्ज वसूली के लिए गये रिकवरी एजेंट ने टेªक्टर से कुचलकर किसान को मार डाला और टेªक्टर लेकर फरार हो गया। मृतक किसान ज्ञानचंद पर 65 हजार रूपये का कर्ज बकायाथा जिसे चुकाने के लिए ज्ञानचंद दूसरे के खेत को जा रहा था।


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