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मीडियाः टीआरपी की चकाचैंध में विलुप्त होती विश्वसनीयता

07-03-2018 11:56:50 पब्लिश - एडमिन


हरिद्वार। मीडिया से सरोकार और संवदेनाओं का क्षरण होने की बहस के दरम्यान देश के नम्बर वन कहे जाने वाले लोकप्रिय हिन्दी चैनल ‘‘आजतक’’ से पुण्य प्रसून वाजपेयी की विदाई ने समूचे मीडिया जगत में हलचल सी मचा रखी है। प्रसून के रात दस बजे प्रसारित होने वाले शो ‘‘दस्तक’’ का शुमार उन चुनींदा शो में होता है जो दर्शकों की कसौटी पर खरा उतरे हैं। ‘‘दस्तक’’ के जरिये पुण्य प्रसून वाजपेयी ने समाज, साहित्य से लेकर उद्योग और राजनीति से जुड़े तमाम अनछुए पहलुओं को भावपूर्ण ढंग से उठाते हुए दर्शकों के दिलों पर दस्तक दी। अपने प्रभावशाली प्रस्तुतीकरण के बूते प्रसून ने बेशुमार दर्शकों को प्यार हासिल किया। यही वजह है कि उनके आजतक से विदाई के बाद उनके फैन्स आहत हैं। मगर उन्हें संतोष है कि सामाजिक सरोकार और संवेदनाओं से जुड़ा उनका मनपंसद पत्रकार और एंकर किसी नये चैनल (संभवतः एबीपी) पर नये तेवरों के साथ दस्तक देगा।
मीडिया जगत में पत्रकारों से लेकर सम्पादकों का इधर उधर आना जाना लगा रहता है। वक्त वक्त पर मीडियाकर्मी एक संस्थान छोड़कर दूसरे संस्थान को ज्वाइन करते हैं। किसी को छोड़ने और कहीं ज्वाइन करने के अनेक कारण होते हैं। कहीं वेतन विसंगति मुददा होती है तो कहीं प्रोन्नति को लेकर नाराजगी होती है लेकिन पुण्य प्रसून वाजपेयी के मामले में ऐसा कुछ नहीं था, बावजूद उनकी विदाई हुई तो सवाल उठना स्वाभाविक है। एक चर्चा यह है कि सत्ता की चैखट पर आदर्शो, सिद्धान्तों की बलि देकर ‘‘गोदी मीडिया’’ बन चुके मीडिया में पुण्य प्रसून वाजपेयी अप्रासंगिक हो गये थे। उनका सत्ता के मिजाज के खिलाफ मुखर होना सत्ता को रास नहीं आया। आजतक को चलाने वाले मीडिया ग्रुप ने पिछले दिनों एक महिला पत्रकार को इसी वजह से हटा दिया था क्योंकि उन्होंने सोशल मीडिया पर कुछ एंकर्स और मीडियाकर्मियों की भूमिका पर कटाक्ष किया था। ऐसे में पुण्य प्रसून वाजपेयी का आजतक से चले जाना इशारा करता है कि कहीं न कहीं कुछ न कुछ ऐसा था जो उनकी विदाई की वजह बना। दूसरी वजह पुण्य प्रसून वाजपेयी और आउटपुट हेड मनीष कुमार के बीच श्रीदेवी की मौत के कवरेज पर हुए मतभेदों को माना जा रहा है। बताते हैं कि पुण्य प्रसून वाजपेयी ने श्रीदेवी पर एक खास पैकेज बनाया था जिसे वह लाइव शो के दौरान बीच बीच में दिखाना चाहते थे लेकिन टीआरपी गिरने की आशंका के चलते मनीषकुमार ने मना कर दिया। तीसरी वजह ऐसी है इस पर ज्यादा तवज्जो नहीं दी जा रही है लेकिन कुछ मीडियाकर्मियों का मानना है कि पिछले दिनों एक कार्यक्रम में दिल्ली आये योगगुरू बाबा रामदेव से उनकी बहस है। गौरतलब है कि उस शो में पुण्य प्रसून वाजपेयी ने योगगुरू बाबा रामदेव से पूछ लिया था कि क्या उन्होंने कर अदायगी से बचने के लिए तो अपने कारोबारी साम्राज्य का ट्रस्ट तो नहीं बनाया। इस पर रामदेव भडक गये थे। मीडियाकर्मियों का मानना है कि कारोबारी फायदे के लिए सिद्धान्तों की बलि देने वाले मीडिया ने योगगुरू बाबा रामदेव से मिलने वाले करोड़ों रूप्ये के विज्ञापनों के हाथ से निकलने की आशंका के चलते पुण्य प्रसून वाजपेयी की भूमिका तय की है। मीडिया पर योगगुरू बाबा रामदेव के असर का ही नतीजा है कि उनकी कम्पनी द्वारा चीन भेजी जा रही चंदन की लकड़ी को पकड़े जाने की खबर किसी प्रमुख मीडिया चैनल पर प्रसारित नहीं हुई। जबकि बाबा रामदेव ने लकड़ी निर्यात के मुददे पर दिल्ली हाईकोर्ट की शरण ली। बहरहाल वजह जो भी रही हो लेकिन कुछ तो है जो सामने नहीं आ रहा है। बकौल मिर्जा गालिबः-‘‘बेखुदी बेसबब नहीं गालिब, कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है!’’ यानि कुछ या बहुत कुछ ऐसा है जो फिलहाल पर्दें में हैं।
वर्तमान में भारतीय पत्रकारिता उस नाजुक दौर से गुजर रही है जहां उसकी भूमिका पर बहस छिड़ी हुई हैं। सरोकार और संवदेनाएं छीजते जा रहे हैं। राष्ट्रवाद का चोला ओढ़कर सत्ता का गुणगान करने वाले चैनलों और अखबारों में बहुत कम ऐसे मीडियाकर्मी रह गये हैं जिन्होंने समझौता करने के बजाय गोदी मीडिया का हिस्सा बन चुके संस्थानों को छोड़ा। विनोद दुआ ऐसे ही मीडियाकर्मी हैं जिन्होंने मीडिया से अलग सोशल मीडिया को अपना भावनात्मक अभिव्यक्ति का जरिया बनाया। विनोद दुआ ही नहीं अनेक जाने माने मीडियाकर्मी गोदी मीडिया से अलग होकर स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं। पिछले दिनों राज्यसभा चैनल से विदा होने वाले राजेश बादल ने अपनी फेसबुक पर वाल पर इस सच को तहे दिल से कबूल किया था कि मीडिया में सब कुछ निष्पक्ष नहीं होता। एक पंक्ति के इस वाक्य में उन्होेंने मीडिया की निष्पक्षता और तटस्थता को बेहद सटीक तरीके से समाज के सामने रखा। कहने का तात्पर्य यह है कि अगर समाज का आईना कहे जाने वाले मीडिया में निष्पक्षता और तटस्थता का क्षरण हुआ है तो फिर कितनी बहस कीजिये। हर आवाज नक्कारखाने मेें तूती की आवाज बनकर रह जायेगी।
क्या यह शर्मनाक नहीं कि भारतीय मीडिया की भूमिका पर विदेशी मीडिया कटाक्ष करते हुए सही भूमिका निभाने की नसीहत दे रहा हैं। श्रीदेवी प्रकरण पर खाडी के अखबार ‘‘खलीज टाइम्स’ की तल्ख टिप्पणी हो या फिर दुबई में मंदिर मुददे पर भारतीय मीडिया के प्रिंस के जयश्रीराम के उदघोष से सम्बोधन का शुभारम्भ जैसी फेक न्यूज पर तीखी प्रतिक्रिया और इनके बीच वैश्विक मीडिया में गिरती भारतीय मीडिया की विश्वसनीयता यानि हालात अनुकूल नहीं है। यह सब इशारा कर रहा है कि भारतीय मीडिया अपने मूल पथ से विचलित होकर ऐसी खाई की तरफ अग्रसर है जहां पहुंचकर वह अपनी विश्वसनीयता गंवा देगा। इसे विडम्बना ही कहा जायेगा कि जो भारतीय मीडिया क्रूर ब्रिटिश साम्राज्यवादी हुकूमत के आगे नहीं झुका वह कारोबारी फायदे के लिए सत्ता का भोंपू बन चुका हैं। 
खबरिया चैनलों ने मीडिया की भूमिका को नवाबों के इशारों के नाचने वाली तवायफ की शक्ल दे दी है। सीधा सा तर्क दिया जाता है कि जो दिखता है वही बिकता है यानि मीडिया उत्पादों को बेचने की मंडी बन चुका है। श्रीदेवी के आवास पर अमिताभ बच्चन का जाना ब्रेकिंग न्यूज है लेकिन बिहार में सत्तारूढ़ दल के नेता की गाडी से नौ बच्चों का कुचल जाना खबर नहीं है। श्रीदेवी की मौत के मातम में नौ बच्चों का कुचला जाना अगर मीडिया में जगह नहीं बनाता तो फिर इस मीडिया से सामाजिक सरोकारों और संवेदनाओं की अपेक्षा करने की गुंजाइश नहीं रहती।
किसी जमाने में कहा जाता था कि-‘‘खेंचों न कमानों को न तलवार निकालों/जब तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो।‘’ मगर आज मायने तब्दील हो गये हैं। अब तो यह कहना ज्यादा मुनासिब नजर आता है कि ‘‘कलम जेब में रखों, न सवाल उछालो/जब तिजोरी भरनी हो तो अखबार निकालो’’। कड़वी सच्चाई यही है कि वर्तमान मीडिया जन सरोकारों और संवेदनाओं से दूर होकर कारोबारी फायदे के लिए नतमस्तक हो चुका है जिसका नतीजा देर सवेर उसके लिए नुकसानदेह होगा। निकट भविष्य में जनता मीडिया की भूमिका से खिन्न हो जाये तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगा। सोशल मीडिया वैसे भी मीडिया के दोनों रूपों यानि प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया के लिए चुनौती बनता जा रहा है। जब आम आदमी को अपनी भावनात्मक अभिव्यक्ति के लिए सहज और सशक्त मंच मिल जाये तो उसे किसी अन्य मीडिया की आवश्यकता नहीं रह जाती।
(आजाद भारतीःजर्नलिस्ट एवं पूर्व एडिटर)


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