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अभिसार शर्मा की विरोधियों को खरी खरी

08-03-2018 17:11:14 पब्लिश - एडमिन



नई दिल्ली। सरकार के खिलाफ बोलने वाले पत्रकार माने जाने वाले अभिसार शर्मा ने बड़े धीर गम्भीर और तल्ख शब्दों के साथ पत्रकार की व्याख्या करते हुए कहा कि कभी मीडिया को सशक्त विपक्ष माना जाता था और परोक्षतः कहीं न कहीं अलिखित साझेदारी होती थी। वह यह तो नहीं कहते कि पत्रकार विपक्ष का प्रवक्ता बन जाये लेकिन कम से कम सरकार या भाजपा के प्रवक्ता तो न बने। उन्होंने कहा कि मैं देख रहा हूं कि अधिकांश चैनल पर विपक्ष की मोदी सरकार को ताजा चुनौती पर बहुत कुछ कहा जा रहा है। कोई इसे ख्याली पुलाव करार दे रहा है तो काई मुंगेरीलाल के सपने बताकर मजाक उडाता नजर आ रहा है। कोई कह रहा है कि यह नहीं चल पायेगा। सभी ने पहले ही अपना फैसला सुना दिया है और यह काम भला हम क्यों करने लगे? चुनौती कितनी गम्भीर है, इस पर चर्चा हो बहस हो लेकिन बकवास कहकर खारिज तो नहीं किया जा सकता।
अभिसार शर्मा ने नाम लिये बिना एक महिला पत्रकार का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ दिनों पहले एक दीदी और भाई से मुलाकात हुई तो दीदी ने कहा किः-‘‘अभिसार आपकी आंखों में मोदी जी के लिए जहर क्यों हैं?’’ जबकि वह दीदी खुद यह बताना भूल गई कि उनके रोम रोम में मोदी जी के लिए भक्ति रस रहा था, क्यों न हो? उनके पति मोदी सरकार के कर्मचारी हैं। दीदी के बाद भाई साहब बोले कि अभिसार तुम्हें निष्पक्ष होना चाहिए किसी का पक्ष नहीं लेना चाहिए। हां, भाई साहब की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं में उनका साथ दिया होता तो बोलते कि मुझसे महान कोई पत्रकार नही होता इनके लिए।
सरकार विरोधी पत्रकार होने के आरोपों का जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि जब उन्होंने एक पीसी में कांग्रेस नेता और जाने माने अधिवक्ता सलमान खुर्शीद की बखिया उधेड़ी तो उनकी मुक्तकंठ से प्रशंसा की गई? जब अन्ना आन्दोलन में साथ दिया तो तब क्यों निष्पक्षता की नसीहत नहीं दी गई? जब रामलीला मैदान में योगगुरू बाबा रामदेव पर हमला हुआ और जब सवाल का जवाब न देने पर राजद प्रमुख लालू प्रसाद यादव को कार्यक्रम से बाहर किया तब उन्हें भाजपा का दलाल क्यों नहीं बताया गया? उन्होंने कहा कि मगर पीएम मोदी जी से प्रश्न करो, तो क्या दीदी और क्या भईया और क्या मित्र पत्रकार सब बुरा मानते हैं। क्यों भाई? क्या मोदी लिखवा कर लाये है कि कोई उनकी आलोचना नहीं कर सकता? तेज तर्रार पत्रकार अभिसार आगे कहते हैं कि दलित-मुस्लिमों के प्रति या युवाओं के साथ ज्यादती होती अथवा नाइंसाफी होती है तो क्यों न सवाल करूं? क्यों न सवाल करूं पीएम की खामोशी पर? फिर भाई लोग कहते हैं कि देश को पहली मर्तबा बोलने वाला प्रधानमंत्री मिला है। कोई क्यों नहीं समझता कि अपनी शर्तो पर बोलने वाला पीएम मिला हैं। समझ गये ना फर्क?
मीडिया और शिक्षा तथा संस्थाओं का सत्यानाश होता देखते रहिये। किस भारत का निर्माण हो रहा है! बतायें! अभिसार ने कहा कि जो पत्रकारिता दो दशक के दौरान नहीं बदली उसे पीएम मोदी जी के लिए नहीं बदलूंगा। उन्होंने कहा कि डंके की चोट पर सरकार को कटघरे में खड़ा करना पत्रकारिता है। यही सीखा है और यही करता रहूंगा। क्योंकि उनका मानना है कि सरकारी दम के खिलाफ पत्रकार रक्षा की पहली लाईन फस्र्ट लाइन आफ डिफेंस है। वह नहीं बदलेंगे, क्योंकि वह सरकार है जो आपकी आवाज खामोश करने में विश्वास रखती हैं, उनके मित्र जानते हैं कि वह क्या कह रहे हैं! 
(साभार-हिन्दी सियासत)


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