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पदमावतः मामले को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश नाकाम

28-01-2018 18:11:42 पब्लिश - एडमिन


गुरुग्राम। गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर रिलीज हुई संजय लीला भंसाली की चर्चित फिल्म ‘पदमावत’ के खिलाफ चल रहे आन्दोलन को साम्प्रदायिक रंग देने की कोशिश को गुरुग्राम पुलिस ने तत्काल नाकाम कर दिया। मामला दरअसल यह है कि फिल्म के विरोध में सड़कों पर उतरे आन्दोलनकारियों द्वारा स्कूली बस को निशाना बनाने की खबर पर जब सोशल मीडिया पर जनाक्रोश फूटा तो चंडीगढ़ की एक भाजपा नेत्री ने स्कूली बस पर हमला करने वालों को मुस्लिम युवक करार देते हुए लिख दिया कि पुलिस ने ऐसे तीन हमलावरों को गिरफ्तार किया है। लेकिन भाजपा नेत्री की इस कोशिश को गुरुग्राम पुलिस ने सोशल मीडिया पर ही खारिज कर दिया। पुलिस ने साफ कहा कि हमलावर मुस्लिम युवक नहीं थे और न पुलिस ने कोई गिरफ्तारी की है। बाद में भाजपा नेत्री ने माफी मांगते हुए पोस्ट डिलीट कर दी। 

उल्लेखनीय है कि संजय लीला भंसाली की विवादों में फंसी फिल्म ‘पदमावत’ को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी के बाद गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या 25 जनवरी को रिलीज किया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद करणी सेना सहित अनेक संगठनों ने ऐलान कर दिया कि वह किसी कीमत पर फिल्म को रिलीज नहीं होने देगे। भाजपा शासित राज्यों के कई मुख्यमंत्रियों ने फिल्म के विरोध को देखते हुए कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका देखते हुए हाथ खड़े कर दिये जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि कानून व्यवस्था कायम रखना सरकार की जिम्मेदारी है लेकिन राज्य सरकारों के रवैये को देखते हुए सिनेमाघर स्वामियों ने स्वयं ही जोखिम उठाने से इन्कार कर दिया। इस दौरान गुरुग्राम में स्कूली बस को आन्दोलनकारियों ने निशाना बनाया तो सोशल मीडिया पर आन्दोलनकारियों के खिलाफ रोष फूट पड़ा जिससे विचलित होकर भाजपा नेत्री ने बस हमलावरों को मुस्लिम करार देते हुए पोस्ट डाल दी ताकि रोष व्यक्त करने वाले मुस्लिमों के खिलाफ भड़क जाये किन्तु गुरुग्राम पुलिस की तत्परता से मामला शांत हो गया। भाजपा नेत्री को भी पोस्ट हटाकर माफी मांगनी पड़ी।

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के बशीरहाट में एक युवक की धार्मिक पोस्ट पर भड़की हिंसा को लेकर भी पंजाब की ही एक भाजपा नेत्री ने भोजपुरी फिल्म के एक सीन को सोशल मीडिया पर डालते हुए यह दर्शाने की कोशिश की थी कि जीप में फटे कपड़ों में बंधक बनी बैठी महिला के साथ यह बर्बरता करने वाले मुस्लिम थे। इस मामले में भी पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया था। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि दोषियों के पैरोकार उनकी करतूतों पर उमडे जनाक्रोश को शांत करने के बजाय उसे भड़काने के लिए साम्प्रदायिक रंग देने के लिए सोशल मीडिया के मंच का प्रयोग क्यों करते हैं! मुजफ्फरनगर का दंगा हो या सहारनपुर के शब्बीरपुर की हिंसा का मामला हर जगह सोशल मीडिया के दुरुपयोग की घटना सामने आ रही है। पुलिस जब तक कार्रवाई करती है तब सोशल मीडिया पर आयी सामग्री से माहौल खराब हो चुका होता है। कभी कभी टकराव भी हो जाता है। सोशल मीडिया के दुरुप्रयोग पर रोक लगाने के लिए कोई भी कारगर तकनीक न होना सरकारों के लिए समस्या बना हुआ है। सोशल मीडिया संचालक भी ऐसे मामलों में हाथ खड़े कर देते हैं। 

गुरुग्राम से मनु महेता की रिपोर्ट 


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