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भूखे लोगों का सेहत की दवा बांटने वाले

28-01-2018 18:16:28 पब्लिश - एडमिन



दिल्ली के बवाना में एक फैक्ट्री में हुए दर्दनाक हादसे में 17 मजदूरों की जीते जी चिता जल गयी....। जबकि प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार 25 शव निकाले गये थे लेकिन मजदूरों की इस ‘आंखों देखी’ का कोई साक्ष्य किसी के पास नहीं था। सच से सरोकार रखने का दावा करने वाला मीडिया भी चुप था! किसी को मजदूरों से मिलकर यह जानने में कतई रूचि नहीं थी कि मृतकों और घायलों की वास्तविक संख्या कितनी है और हादसे की असली वजह क्या है

मीडिया के लिए यह ‘‘बिग ब्रेकिंग न्यूज’’ थी। कुछ चैनलों के बड़े पत्रकार/कैमरामैन पहुंच चुके थे। ओवी वैन भी घटनास्थल पर मौजूद थी। आश्चर्य नहीं बल्कि अफसोस की बात यह थी कि सामाजिक सरोकारों का आईना कहे जाने वाले मीडिया का कोई पत्रकार या कैमरामैन भाग्यशाली रहे मजदूरों से मिल कर हकीकत जाने का ख्वाहिशमंद नहीं था और न उसे यह जानने में दिलचस्पी थी कि 10 से 12 घंटे काम कराकर उन्हें कितना मेहनताना दिया जाता है! क्या क्या सुविधाएं दी जाती है! हादसों के लिए कोई इन्तजाम है कि नहीं! सामाजिक सरोकारों से गहराई से जुड़े दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार अजय प्रकाश ने साथी पत्रकारों से जब मजदूरों से बात करने को कहा तो मीडियाकर्मियों का जवाब घोर आश्चर्यजनक था। उन्होंने कहा कि-‘‘ कुछ हो तो पूछा भी जाये’’ कहने का मतलब यह है कि दो दर्जन मजदूरों की दुखद मौत सामाजिक सरोकार के उन झंडाबरदारों की नजरों में ‘कुछ नहीं’’ था। मीडिया के इस रवैये और चेहरे पर रोयें या हंसे, यह आपको खुद तय करना होगा।

टीआरपी और रीडरशिप के आंकड़ों में उलझे मीडिया में शायद सामाजिक संवेदनाएं शून्य हो चुकी है। मीडिया की नजरों में अब लोगों की मौतें ब्रेकिंग न्यूज के अलावा कुछ नहीं रह गयी है। मुझे याद है जब दस साल पूर्व मैं एक सांध्य दैनिक का समाचार सम्पादक हुआ करता था तो अलसुबह एक फील्ड रिपोर्टर का फोन आया। उस वक्त मैंने नाश्ता भी नहीं किया था। रिपोर्टर ने कहा, ‘‘सर मजा आ गया आज सुबह सुबह फस्र्ट लीड मिल गयी। न्यूज चैनलों की दुनिया में जो अहमियत बिग ब्रेकिंग की होती है वही सांध्य दैनिक में दिन की सबसे बड़ी खबर यानि फस्र्ट लीड की होती है। मैेंने रिपोर्टर से पूछा, ‘‘क्यों क्या हुआ?’’ उसने जो जवाब दिया तो मैं सन्न रह गया। समझ में नहीं आया कि पत्रकार की बात पर कहकहा लगाकर हंसू या मीडिया से लुप्त होती संवदेनाओं पर मातम करूं! रिपोर्टर के शब्द थे-‘‘सर, एक कार एक्सीडेंट में एक ही परिवार के चार लोगों की मौके पर ही मौत हो गयी। हैं, ना जोरदार फस्र्ट लीड’’

एक क्षेत्रीय सांध्य दैनिक के लिए वाकई यह बड़ी खबर थी कि एक्सीडेंट में एक ही परिवार के चार लोगों की मौत हो जाये। बहरहाल उस दिन वही खबर फस्र्ट लीड बनी। रिपोर्टर खुश था कि उसका समाचार फस्र्ट लीड बना। जबकि मैं देर रात तक यही सोचता रहा कि क्या मौतें भी मीडिया के लिए चटपटा मसाला हो गयी है! एक और घटना याद आती है। बात लगभग दो या तीन साल पुरानी है। कुछ न्यूज चैनल पत्रकारों के साथ एक चैनल के सिटी कार्यालय में बैठा था। रहस्यमयी बीमारी से एक ही परिवार के तीन बच्चों की मौत पर चर्चा के दौरान मैंने न्यूज चैनल के पत्रकारों से कहा कि-‘इस न्यूज पर स्टोरी क्यों नहीं करते! परिवार के लोगों की बाइट लो, सीएमओ/सीएमएस से पूछो और विधायक से भी बात करो।’ साथियों का जवाब हैरान कर देने वाला था। बोले-‘‘ भाई जी ऐसी स्टोरी बताओ कि कुछ खर्चा पानी हाथ आये। इस समाचार के लिए 25-26 किमी सफर करो लेकिन हासिल क्या होगा!’

इन घटनाओं के उल्लेख का तात्पर्य यही है कि बदले जमाने में मीडिया संवेदना शून्य होता जा रहा है! क्राइम और कन्ट्रोवर्सियल बयानबाजी में बिग ब्रेकिंग तलाशने वाला मीडिया क्या उस आम आदमी से दूर हो गया है जो उसकी टीआरपी के मानक तय करता है, उसकी रीडरशिप का हिस्सा बनता है। दोष किसका है! शायद मीडिया समूह के मालिक और प्रबन्यकों के लिए आम आदमी का दर्द महज खबर के अलावा और कोई महत्व नहीं रखता। सही भी है जब पंूजीवाद की आंधी में सामाजिक ताना-बाना छिन्न भिन्न हो रहा हो वैश्विकरण की आंधी में प्रतिस्पद्र्धा में बने रहना चुनौती बन चुका हो तो फिर मीडिया क्यों न बदले! मजदूरों की लाशें गिनने से क्या हासिल होगा? ऐसे में याद आते हैं स्व. एसपी सिंह। सामाजिक सरोकारों और संस्कारों से इतनी गहराई से जुड़े थे कि तीन दशक पूर्व हरियाणा के डबवाली में एक कार्यक्रम के दौरान पंडाल में लगी आग में जब मासूम स्कूली बच्चों की मौत हो गयी तो खबर बनाते बनाते एसपी सिंह इस कदर भावुक हुए कि उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया। उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया लेकिन लाख कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। बाजारीकरण की आंधी में एसपी सिंह जैसे सरोकारी और संवदेनशील पत्रकार/सम्पादक कहीं खो गये हैं।

राजनीति से लेकर मीडिया तक जब मरने वालों की तादाद गर्मागर्म बहस का मुददा बन जाये तो फिर संवेदना पर चिन्तन करना व्यर्थ हैं। लोग भूख से मरे या कर्ज से, मौत बस एक हैड लाईन है, ब्रेकिंग न्यूज है। अलबत्ता संसद से लेकर चैनलों के स्टूडियों में भूख और कर्ज से मरने वाले लोगों की मौतों पर डिबेट खूब होती है। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के दौरान खुले में रखे सड़ रहे खाद्यान्न को लेकर देश की सबसे बड़ी अदालत ने कहा था कि खराब हो रहे खाद्यान्न को क्यों न गरीबों में बांट दिया जाये तो उस समय के नागरिक खाद्य आपूर्ति मंत्री ने कहा था कि ‘हम सरकार चला रहे हैं अनाथालाय नहीं।’ यानि खाद्यान्न का सड़ना सरकार की नीति में शामिल हैं लेकिन भूख से होने वाली मौतों को रोकना महज नारे के सिवा कुछ नहीं। मौत मजदूर की हो या किसान की अथवा महिला और बच्चों की, मौतें सियासत के दरबार में मुददे के सिवा कुछ नहीं। वहां आश्वासन है, क्रियान्वयन नहीं। इसी पर मशहूर कवि और गीतकार नीरज जी के शब्दों में

‘‘आदमी खुद को कभी यूं भी सजा देता है

अपने दामन से खुद शोलों को हवा देता है।

तू खड़ा होकर कहां मांग रहा है रोटी

ये सियासत का नगर सिर्फ दगा देता है।

मुझको उस वैद्य की विद्या पर तरस आता है

भूखे लोगों को जो सेहत की दवा देता है।’’

मीडियाकर्मी और सियासी नुमांइदे भूखे लोगों को सेहत की दवा बांटने वाले वैद्य बनते जा रहे हैं..! नीरज जी ने सही कहा है कि सियासत के दरबार से भूखों को रोटी नहीं मिलती बल्कि मिलते हैं कोरे आश्वासन यानि दगा। जहां तक कल्याणकारी योजनाओं और क्रार्यक्रमों की बात है तो यही भूखे लोगों को सेहत की दवा देने की बचकानी कवायद है। अफसोस कि आजादी के सात दशक गुजरने के बावजूद भूख और कर्ज से होने वाली मौतों का सिलसिला बदस्तूर जारी है। ‘गरीबी हटाने’ का दावा करने वाली कांग्रेस हो या ‘अच्छे दिनों’ का नारा देने वाली भाजपा दोनों के शासन में न गरीबी मिटी और न अच्छे दिन आये। भूख से मरने वाले गरीबों और कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्या सिलसिला जारी है। जमाना बदला, निजाम बदले, नीतियां बदली, नहीं बदली तो भूखे गरीबों और किसानों की किस्मत जो राजनेताओं की मुठठी में कैद है। आप पदमावत को लेकर बहस कीजिये। मजदूरों की मौत कोई बहस का मुददा नहीं। ठीक उसी तरह जैसे चिकित्सकों की हड़ताल से बच्चों की मौत ‘ऐश्वर्या का लहंगा और अभिषेक की शेरवानी कहां सिले’ की एक्सक्लूसिव बिग ब्रेकिंग न्यूज के बीचे दब जाती है। 

(आजाद भारती- पूर्व न्यूज एडिटर और जर्नलिस्ट)

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