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मूर्तियां गिराने से विचारधारा खत्म नहीं होती

08-03-2018 13:39:57 पब्लिश - एडमिन


त्रिपुरा। देश के सबसे गरीब मुख्यमंत्री माणिक सरकार के नेतृत्व में बनी वामदल की सरकार सूबे की सत्ता से बाहर हो गयी और भाजपा ने शानदार जीत का परचम लहराया। भाजपा ने इससे पहले पूर्व के सबसे बड़े राज्य असम में भी बरसों से काबिज कांग्रेस और असम गण परिषद को करारी शिकस्त देते हुए अपने दम पर सरकार बनायी थी लेकिन त्रिपुरा की जीत के अलग मायने हैं। यह वामपंथ का अभेद्य दुर्ग समझा जा रहा था। आज भले ही वरिष्ठ माकपा नेता सीताराम येचुरी भाजपा पर धनबल और सत्ताबल के इस्तेमाल का आरोप लगाये लेकिन कड़वी सच्चाई यही है कि पिछले 25 साल से त्रिपुरा पर काबिज वामपंथ आक्रामक तेवरों के साथ मैदान में उतरी दक्षिणपंथी कही जाने वाली भाजपा से हार गया। राजनीति मे हार जीत मायने रखती है न कि जीतने के तौर तरीके। वामदल हारा और भाजपा यही जीती यही शाश्वत सत्य है जिसे किन्हीं तर्को के सहारे नकारा नहीं जा सकता। 
त्रिपुरा में शानदार जीत के बाद भाजपा उत्साहित है। उत्साह से भरे भाजपा ने त्रिपुरा में नये युग की शुरूआत की लेकिन जीत के फौरन बाद जिस तरह त्रिपुरा में कम्युनिस्ट क्रान्ति के महानायक कहे जाने वाले लेनिन की प्रतिमा को ध्वस्त किया गया वह किसी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। अनेक सीनियर जर्नलिस्टों ने इस घटना की निंदा की है। जीत के जश्न में ऐसी घटनाओं का होना जीतने वाले दल के दम्भ को दर्शाता है जिसे स्वीकारा नहीं जा सकता। सत्ता परिवर्तन राजनीति की स्वाभाविक प्रक्रिया है। कल कोई गैर भाजपाई दल राज्य की सत्ता में आये और भाजपा के प्रतीक चिन्हों को ध्वस्त करे तो क्या भाजपा के पुरोधा इसे स्वीकार करेंगे। त्रिपुरा के घटनाक्रम की पुनरावृत्ति कोलकाता में हुई जहां भाजपा के आदर्श पुरूषों में शुमार प. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की प्रतिमा पर कालिख पोत दी गयी। त्रिपुरा में लेनिन की प्रतिमा ढहाने का समर्थन करने वाले क्या मुखर्जी की प्रतिमा का अपमान बर्दाश्त करंेगे! यह बहुत अच्छा है कि स्वयं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ऐसी घटनाओं का संज्ञान लिया और कार्यकर्ताओं को कड़ी नसीहत दी। इस बीच अम्बेडकरवादियों के आदर्श महापुरूष संत पेरियार की प्रतिमा को भी अपमानित किये जाने की घटना सामने आई है। कहने का तात्पर्य यह कि वैचारिक मतभेद विध्वंस को प्रश्रय दे रहे हैं जो उचित नहीं है। प्रतीक पुरूषों या प्रतीक चिन्हों को ध्वस्त करने से विचारधारा नहीं मिटा करती। किसी भी विचार को विचार से ही खत्म किया जा सकता। इस किस्म की घटनाओं को अन्जाम देने वाले लोग क्या अफगानिस्तान के बामियान में स्थित महात्मा बुद्ध की विशालकाय प्रतिमाओं को बारूद से उड़ाने वाले तालिबानियों की विचारधारा को पोषित नहीं करते। 
वरिष्ठ पत्रकार राणा यशवंत सिंह ने अपनी फेसबुक वाल पर ब्लादिमीर पुतिन की प्रतिमा को ध्वस्त करने के घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि लेनिन को समझने के लिए लेनिन को पढ़ना होगा। भले ही जारशाही के खात्मे बाद सत्ता हासिल करने वाले लेनिन में कुछ कमियां रही हो और उनके कुछ फैसलों से जनता को असुविधाओं का सामना करना  पड़ा हो लेकिन इस महान क्रांतिकारी के योगदान को कम करके आंकना या उसे खलनायक करार देना समझ से परे हैं। राजनीति में कोई सबकों संतुष्ट नहीं कर सकता। उदाहरण के तौर पर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस समय विश्व के सबसे लोकप्रिय नेताओं में शामिल हैं लेकिन उनकी कुछ नीतियों से जनता को नाराजगी है तो क्या जनता भाजपा के आदर्श पुरूषों की प्रतिमाओं पर गुस्सा उतारने को आगे आ जाये। राजनीति में सहिष्णुता बेहद जरूरी है। भले ही कोई किसी दल के आदर्श महापुरूष की नीतियों और विचारधारा से सहमत न हो लेकिन उस व्यक्ति को ऐसी बात कहने का अधिकार नहीं जिससे उस महापुरूष में आस्था रखने वालों की भावनाएं आहत हों। लोकतंत्र में हर किसी को वैचारिक अभिव्यक्ति का मौलिक अधिकार है लेकिन इसकी सीमा वहीं तक हैं जहां दूसरे की भावनाएं आहत न हो। दुर्भाग्यवश त्रिपुरा और कोलकाता में यही हुआ। 
भारत में लोकतंत्र है जिसकी महानता का वैश्विक समुदाय में स्वागत समर्थन किया जाता है। त्रिपुरा और कोलकाता की घटनाएं लोकतंत्र की मर्यादाओं का चीरहरण करती प्रतीत हो रही है। लेनिन हो या मुखर्जी, अम्बेडकर हो या महात्मा गांधी सवा सौ करोड़ की विशाल आबादी वाले गणतंत्र में सभी को मानने वाले मौजूद हैं। तालिबानियों के मानस पुत्रों को ध्यान रखना चाहिए कि प्रतिमाओं पर कालिख पोतने या गिराने से विचारधाराएं खत्म नहीं होती। गांधी की विचारधारा क्या उन्हें खत्म करने के बाद खत्म हो गयी! देश के अलग अलग कोने में कभी महात्मा गांधी तो कभी डा. अम्बेडकर, कभी नेहरू तो कभी किसी अन्य की प्रतिमाओं को खंडित या अपमानित करने की घटनाएं हुई। विरोध में उपद्रव भी हुए लेकिन न गांधीवाद का खात्मा हुआ और न नेहरू की नीतियां अप्रासंगिक हुई। डा. अम्बेडकर को आज भी तमाम दलों के नेता स्वीकार करते हैं किन्तु उनकी प्रतिमाओं को भी खंडित और अपमानित किया गया है। जब गोली मारने से गांधीवाद खत्म नहीं....बामियान से महात्मा बुद्ध की प्रतिमा गिराने से बुद्धिज्म खत्म नहीं हुआ तो फिर लेनिन की प्रतिमा ढहाने से लेनिनवाद कैसे खत्म हो पायेगा!
(संजय कश्यपः-चीफ एडिटर आक्रोश4मीडिया)


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