कलमवीर बने ब्याजवीर, बेखौफ चल रहा गोरखधंधा

14-01-2018 12:27:53 पब्लिश - एडमिन



‘‘पैसा चाहिए, हमारे पास आईये।’’ लेकिन ठहरिये यह किसी सरकारी या निजी बैंक का जरूरतमंद लोगों को लुभाने वाला स्लोगन नहीं बल्कि यह स्लोगन समाज के उस जिम्मेदार वर्ग की ओर से दबी जुबान में प्रचारित स्लोगन है जिस वर्ग को समाज की बुराईयों और व्यवस्था में व्याप्त भ्रष्टाचार को उजागर करने की जिम्मेदारी देश के महान संविधान ने दी है। इसी वजह से इस वर्ग को लोकतंत्र का चतुर्थ स्तम्भ कहा जाता है और आम तौर पर माना भी जाता है कि अ्रगर लोकतंत्र का यह चौथा खम्भा मजबूत न होता तो विधायिका और कार्यपालिका के पूरी तरह निरंकुश होने की संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।

मामला तीर्थनगरी के मीडिया के सम्मानित पत्रकारों की संस्था है जिसके पदाधिकारी आजकल अवैध उगाही से जमा धनराशि को ब्याज पर चला रहे है। ब्याज भी दो चार नहीं बल्कि दस प्रतिशत। एक पीडि़त पत्रकार ने इस समस्या से हरिद्वार के कर्तव्यनिष्ठ माने जाने वाले जिलाधिकारी को अवगत कराते हुए उत्पीड़न से मुक्ति दिलाने की मांग करते हुए एक मार्मिक पत्र भी लिखा था। बताया जाता है कि उक्त पीडित पत्रकार ने अब संस्थाओं का पंजीकरण करने वाली सरकारी समिति के रजिस्ट्रार को पत्र लिखकर पत्रकारों की संस्था का रजिस्ट्रेशन निरस्त करने की मांग की है। मीडिया संस्था से जुड़े कुछ लोगों का कहना है कि ब्याज के इस गोरखधंधे में दिग्गज कलमवीरों का ग्रुप चांदी कूट रहा है। इस गु्रप ने मिशन पत्रकारिता का चोला ओढकर समाज और प्रशासन में सम्मानजनक स्थान बना रखा है। मंत्री से लेकर अफसर तक इनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में मंचासीन होकर पत्रकारों की भूमिका और पत्रकारिता की शान में कसीदे पढ़ते हैं। कार्यक्रम का आयोजन हो या अन्य कोई अवसर दिग्गज कलमवीरों का यह धुरंधर गु्रप उगाही करने निकल पड़ता है। क्या संत महात्मा, क्या उद्योगपति और क्या बिल्डर व प्रापर्टी डीलर अथवा सिडकुल क्षेत्र मंें औद्योगिक इकाई चलाने वाले उद्योगपति, कोई इनके दायरे से बाहर नहीं होता।

यही नहीं खनन और शराब कारोबारी से लेकर खाद्यान्न वितरण प्रणाली से जुड़ा तंत्र भी इनकी भेंटपूजा करके अपने कारोबार को बेखौफ चला रहा है। कई चर्चित मामलों में अवैध धंधों में संलिप्त लोगों के कानून के चंगुल में फंसने के बाद या फंसने की संभावना नजर आने पर ‘बड़े पत्रकारों’ का यही समूह उनके बचाव में पैरवी करने पहुंच जाता है। पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों की मनुहार से लेकर दबाव बनाने तक में पत्रकार चर्चाओं में आ चुके हैं। खनन और शराब कारोबारियों सहित अन्य दो नम्बर के अमीरों से प्रतिमाह बंधी बंधाई रकम लेने वाले कलमकारों के कारनामों से राजनीतिज्ञ और नौकरशाह परिचित है लेकिन चोली दामनका साथ होने के कारण खामोशी की चादर ओढे रहने को विवश है।

उल्लेखनीय है कि कुख्यात माफिया सरगनाओं से कथित सांठगांठ के चलते जब पुलिस ने कुछ पत्रकारों को राडार पर लिया तो बड़े पत्रकारों ने बचाव करने में कोई कोर कसर बाकी नहीं रखी। मीडिया जगत को निष्पक्ष और निर्भीक समझने वाले समाज के गणमान्य नागरिकों में मीडियाकर्मियों के आचरण में आ रही गिरावट से चिन्ता तो है लेकिन किसी की समझ में नहीं आ रहा कि लोकतंत्र के इस महत्वपूर्ण स्तम्भ को कैसे भ्रष्टाचाररूपी दीमक से बचाया जाये। कलमवीरों के ब्याजवीरों में बदलने की गाथा लोकतंत्र के चौथे खम्भे में लग रही दीमक का ही प्रतिरूप है। बताया जाता है कि किसी सख्त मुश्किल का शिकार आम आदमी जब कर्ज लेने को मजबूरहो जाता है और उसे किसी भी कीमत पर पैसे की जरूरत पड़ जाती है तो वह कलमवीरों का चोला ओढे बैठे ब्याजवीरों के चंगुल में फंस जाता है। बस यही से उसके शोषण का सिलसिला शुरू हो जाता है। ब्याजवीरों के रसूख को देखते हुए पीडि़त शोषण के खिलाफ मुखर नहीं हो पाता। दस फीसदी ब्याज अदायगी की पीड़ से गुजर रहे पीडि़तों का कहना है कि आये दिन अफसरों और मंत्रियों के संग मंचों पर नजर आने वाले कलमवीरों के खिलाफ बोलने का साहस कौन कर सकता है।

धर्मनगरी हरिद्वार में यूं तो तमाम तरह के अवैध धंधों का बेरोक टोक संचालन हो रहा है लेकिन समाज को आईना दिखाने वाले लोगों का ब्याज का धंधा समाज की उस बुराई को प्रकट करता है जिससे मुक्ति का कोई उपाय किसी के पास नहीं है। जो नौकरशाह इस गोरखधंधे पर लगाम लगाने का अधिकार और क्षमता रखते हैं उन तक और उनके आकाओं यानि राजनेताओं तक इन ब्याजवीरों की सीधी पहुंच होना प्रशासन के लिए चुनौती है। पत्रकारिता की आड में प्रापर्टी डीलिंग, खनन कारोबार और विभिन्न विभागों में ठेकेदारी करने वाले कलमवीरों ने ऐसा सिंडीकेट बना लिया है जिसमें पैसे को ही सब कुछ समझने वाले कलमवीर शामिल है। इस सिंडीकेट में दूसरे राज्यों से आकर बसे कलमवीर भी शामिल है। गंगा पार के जिले के दो चार पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर पैसा बनाने के मामले में खासे चर्चित रहे हैं। कोई चैनल की माइक आईडी उठाये घूम रहा है तो कोई किसी अखबार के नाम पर गोरखधंधा चला रहा है। कुछ पत्रकार खनन कारोबारियों/ प्रापर्टी डीलरों और बिल्डरों के मीडिया मैनेजर की भी भूमिका निभा रहे हैं। कोई मामला उजागर होने पर बाकायदा मोटी रकम लेकर उनके पक्ष में समाचार छपवाने से लेकर अधिकारियों के दर पर दस्तक देने की जिम्मेदारी बखूबी संभालने वाले कलमवीरों का चक्रव्यूह मीडिया जगत को अपने चंगुल में ले चुका है। इसे तोड़ने का साहस करने वाले को अभिमन्यु की तरह वीरगति को प्राप्त होना पड़ता है यानि संस्था से बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है।

हैरत इस बात पर है कि हर साल पत्रकारिता दिवस पर आजादी के आन्दोलन से लेकर सभ्य समाज और मजबूत राष्ट्र के निर्माण में पत्रकारिता की अहमियत पर ओजस्वी भाषण देने वाले प्रथम पंक्ति के वरिष्इ पत्रकार भी चुप्पी साधे हुए हैं। उनकी चुप्पी उनकी विवशता का संकेत है या फिर उनकी संलिप्तता का इस बारे में कोई कुछ नहीं कह सकता!

(हरिद्वार के एक वरिष्ठ पत्रकार की सूचना के आधार पर)

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