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लखनऊ जर्नलिस्ट एसोसिएशन ने कराया पत्रकारों का दस लाख रुपए का बीमा

09-08-2019 17:37:40 पब्लिश - एडमिन

एलजेए बना अपने दम पर 10 लाख का बीमा कराने वाला पहला पत्रकार संगठन  लखनऊ। पत्रकारों के हित के लिए काम करने का दम तो बहुत लोग भरते हैं, पत्रकारों के साथ कोई अनहोनी होने पर बयानों की बाढ़ सी आ जाती है परन्तु वह सब कागजी होकर ही रह जाती है। कुछ चुन...

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पुलिस के सामने कैमरामैन को बुरी तरह पीटा

09-08-2019 14:20:18 पब्लिश - एडमिन

गुरुग्राम - कार चालक पति पत्नी की दबंगई, ट्रैफिक सिग्नल तोड़ने पर रोकने पर पुलिसकर्मी पर चढ़ाई कार, बाल बाल बचा ट्रैफिक पुलिसकर्मी, मौके पर पहुंचे मीडिया कर्मी का कैमरा तोड़ा, पति पत्नी ने कैमरामैन के साथ की मारपीट, पुलिस के सामने कैमरामैन को बुरी तरह पीटा, मारपीट की घटना मोबाइल कैमरे में कैद, सोहना रोड़ पर वाटिका चौक की घटना साइबर सिटी गुरुग्राम में आज सुबह करीब 10:00 बजे सोहना रोड पर रेड लाइट जंप करके भाग रही एक कार को रोकना पुलिसकर्मी को भारी पड़ गया कार में सवार पति पत्नी ने पहले तो ट्रैफिक पुलिसकर्मी पर कार चढ़ाने की कोशिश की और बाद में मीडिया कर्मियों के साथ मारपीट करते हुए उनके कैमरे को तोड़ दिया पुलिस ने आरोपी पति पत्नी को हिरासत में ले लिया है । दिल्ली के पास साइबर सिटी गुरुग्राम में सड़क पर गाड़ी चलाते समय क्यों गुस्से में रहते हैं लोग यह तस्वीरें देखिए और अंदाजा लगाइए कि क्या ऐसे गुस्से वाले लोग सड़क पर गाड़ी चलाते समय किसी बड़े हादसे को दावत तो नहीं दे रहे हैं दरअसल तस्वीरें हैं गुरुग्राम के सोहना रोड पर वाटिका चौक की जब सुबह तकरीबन 10:00 बजे यह हौंडा सिटी कार रेड सिगनल जंप कर गई तभी सामने खड़े ट्रैफिक पुलिसकर्मी सुनील कुमार ने गाड़ी को रोकने का इशारा किया गाड़ी रुक गयी।  कार को ड्राइवर चला रहा था और आकर में पीछे पति पत्नी बैठे थे । जब ट्रैफिक पुलिसकर्मी ने सिग्नल जम्प करने पर चालान करने की बात कही तो कार में पीछे बैठी महिला ने कार के ड्राइवर को हटाकर खुद ड्राइविंग सीट पर आ गयी और ट्रैफिक पुलिसकर्मी पर कार चढ़ाने की कोशिश की इतने में बाकी पुलिसकर्मियों ने कार के सामने अपनी राइटर लगा दी जिसकी वजह से कार रुक गई उसके बाद गाड़ी के कागजात मांगने पर महिला तुरंत ड्राइवर सीट पर आ गई और पुलिस के साथ बदतमीजी करने लगे । वाटिका चौक पर यह घटना होते ही भारी पुलिस बल मौके पर आ गया इतने में मीडिया को खबर लगी तो एक निजी न्यूज़ चैनल के टीम भी मौके पर पहुंच गई जब कैमरा मैंने पूरी घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग करनी चाही तो आरोपी पति का पारा और चढ़ गया उन्होंने निजी टीवी चैनल के कैमरामैन पर हमला कर दिया और उसे पुलिसकर्मियों की मौजूदगी में ही बुरी तरह मारने पीटने लगे इतना ही नहीं आरोपी पति पत्नी ने कैमरामैन का कैमरा भी तोड़ दिया जैसे-तैसे मामले को शांत कराया गया और आरोपी पति पत्नी को हिरासत में लिया गया । आरोपी पति पत्नी की दबंगई की पूरी घटना मोबाइल कैमरे में कैद हो गयी । अब पीड़ित पुलिस कर्मी और पत्रकार की शिकायत पर दोनों आरोपियों के खिलाफ सेक्टर 50 थाने में केस दर्ज किया जा रहा है । मनु मेहता , गुडगाँव आक्रोष4मीडिया भारत का नंबर 1 पोर्टल हैं जो की पत्रकारों व मीडिया जगत से सम्बंधित खबरें छापता है ! आक्रोष4मीडिया को सभी पत्रकार भाइयों की राय और सुझाव की जरूरत है ,सभी पत्रकार भाई शिकायत, अपनी राय ,सुझाव मीडिया जगत से जुड़ी सभी खबरें aakrosh4media2016@gmail.com व वव्हाट्सएप्प पर भेजें 9897606998... |संपर्क करें 9411111862 .खबरों के लिए हमारे फेसबुक आई.डी https://www.facebook.com/aakroshformedia/ पर ज़रूर देखें  ...

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पत्रकार की हत्या व् रेप की सजा काट रहे राम रहीम की पत्नी ने लगाई पैरोल याचिका

06-08-2019 13:52:30 पब्लिश - एडमिन

  • पत्रकार की हत्या व् रेप की सजा काट रहे राम रहीम की पत्नी ने लगाई पैरोल याचिका

राम रहीम की पत्नी ने लगाई पैरोल याचिका चंडीगढ।साध्वियों से दुष्कर्म मामले में रोहतक की सुनारिया जेल में 20 साल की सजा काट रहे राम रहीम की पैरोल के लिए एक बार फिर पंजाब हरियाणा कोर्ट में याचिका लगाई गई है। मिली जानकारी के अनुसार राम रहीम की पत्नी ने ...

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पत्रकार ज्ञानेंद्र सेंगर को सवालों के घेरे में खड़ा कर लगाया आरोप

05-08-2019 15:59:50 पब्लिश - एडमिन

  • पत्रकार ज्ञानेंद्र सेंगर को सवालों के घेरे में खड़ा कर लगाया आरोप

उन्नाव के चर्चित माखी रेप कांड पीड़ित परिवार के साथ रायबरेली में हुए सड़क हादसे में जहां पीड़िता की चाची और मौसी की मौत हो चुकी है। जबकि पीड़िता और उसके वकील की हालत गंभीर बनी हुई है। सड़क हादसे के बाद से ही दोनों को ही वेंटीलेटर और लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर ...

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सरकारी विज्ञापनों के मामले में बड़ा घालमेल उजागर

04-08-2019 16:08:39 पब्लिश - एडमिन

सरकारी धन का गवन आखिर कब नींद से जागेगा जिला प्रशासन  कन्नौज में विज्ञापन के नाम पर बड़ी सरकारी रकम की घपलेबाजी का मामला सामने आया है। यहां की सदर नगर पालिका ने आंख बंद कर एक फर्जी संस्था को 90 हजार रुपये के विज्ञापन दे डाले। एक आरटीआई कार्यकर्ता के पूछे जाने के वाद इस पूरे घपले की परतें खुली। अब नगर पालिका के अफसर अपनी फंसी गर्दन बचाने के तरीके खोजने में जुट गए हैं। कन्नौज में सरकारी विज्ञापनों के मामले में बड़ा घालमेल उजागर हुआ है। नगर पालिका परिषद कन्नौज  ने बस नाम के लिए चल रहीं गायत्री कमनीकेशन पर लाखो  रुपए लुटा दिए। यह खेल तब  उजागर हुआ जब सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के तहत एक सूचनाकर्ता  ने सूचना माँगी। महीनों टालमटोल के बाद जब नगर पालिका ने सूचना का जवाब दिया तो उसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आये हैं। जवाब से पता चलता है कि मीडिया संस्थानों को विज्ञापन देने की सरकारी नीति के स्थान पर पालिका प्रशासन ने अपने चहेते को ही उपकृत किया।नगर पालिका  से लाखों के विज्ञापन स्वच्छता और स्वंत्रता दिवस पर मिले है जो महज एक फ़ोटो कॉपी  करने व किताब की दुकान है जो गायत्री कम्युनिकेशन के नाम से संचालित है। आखिर नगर पालिका परिषद कन्नौज को इस फोटो कॉपी की दुकान को विज्ञापन क्यो  देना पड़ा यह बड़ा  सवाल है। नगर पालिका पहले  फर्म/संस्था के नाम आरओ रिलीज करती है और  फिर चेक भी रिलीज रिलीज़ करती  है। एक चेक का अमाउंट आपको चौका देगा। 30 हजार  रुपए का अमाउंट आखिर क्या जरूरत नगर पालिका को इस संस्था को देने की पड़ी । आपको यह जानकर हैरानी होगी कि यह फर्म नोएडा के पते और कन्नौज के बांच ऑफिस के पते से कन्नौज में संचालित है। आरटीआई कर्ता ने जब यह सूचना नोएडा के पते से ली तो डाक विभाग के पत्राचार ने यह पता चला कि उक्त फर्म /संस्था नोएडा के पते पर संचालित नही है ।कन्नौज ही इसका प्रधान और ब्रांच कार्यालय है वो भी तिर्वा क्रोसिंग के पास।चौंकाने वाला यह खुलासा हाल ही में माँगी गयी एक आरटीआई में आया है ।नगर पालिका परिषद कन्नौज की ओर से गायत्री कम्युनिकेशन को बैंक आफ इंडिया की चेको का विवरण कुछ इस तरह है। चेक संख्या-016526 दिनांक 07-10-2016 को 10 हजार, चेक संख्या 629710 दिनाँक03-04-2017-को 5000 रुपये, चेक संख्या-058337 दिनाँक-16-10-2017--10000 रुपए, चैक संख्या-058472 दिनाँक 24-11-2017--30,000 रुपए, चेक संख्या 068995 दिनांक 23 -02-2018-10,000 रुपए चेक संख्या-069022 दिनाँक 17-03-2018 - 15000 रुपये और चेक संख्या 095404 दिनांक 15-10--2018 --10 हाजर रुपए दिये गये। सबसे बड़ी बात गायत्री कम्युनिकेशन के नाम से नगर पालिका ने जो भुगतान किया है वो भी बिना जीएसटी के है । आक्रोष4मीडिया भारत का नंबर 1 पोर्टल हैं जो की पत्रकारों व मीडिया जगत से सम्बंधित खबरें छापता है ! आक्रोष4मीडिया को सभी पत्रकार भाइयों की राय और सुझाव की जरूरत है ,सभी पत्रकार भाई शिकायत, अपनी राय ,सुझाव मीडिया जगत से जुड़ी सभी खबरें aakrosh4media2016@gmail.com व वव्हाट्सएप्प पर भेजें 9897606998... |संपर्क करें 9411111862 .खबरों के लिए हमारे फेसबुक आई.डी https://www.facebook.com/aakroshformedia/ पर ज़रूर देखें ...

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पत्रकारिता की आड़ में चोरी करने वाले गिरोह का उठा नकाब

02-08-2019 17:23:47 पब्लिश - एडमिन

  • पत्रकारिता की आड़ में चोरी करने वाले गिरोह का उठा नकाब

पत्रकारिता की आड़ में चोरी करने वाले गिरोह का उठा नकाब थाना खैरी घाट की पुलिस ने ट्रांसफार्मर का तेल चोरी कर बेचने वाले एक चोर को गिरफ्तार किया है  पुलिस को सफलता उस वक्त हाथ लगी जब रात्रि गश्त में मामूर था की ग्राम खर खट्टर पुरवा में ट्रांसफार्...

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भारत मे अब तक कोई भी पत्रकार संगठन पत्रकार हितों की रक्षा करने मे तनिक भी समर्थ नही हैं

31-07-2019 12:46:28 पब्लिश - एडमिन

क्योंकि अनेक संगठनों मे शक्तियां बँटी हुयीं हैं दिल्ली। भारत वर्ष मे आजादी के बाद से ही पत्रकारों का हाल बुरा है आजादी के पुर्व से पत्रकारों का समूह अनेक बहु विचारवादी मानसिकता से ग्रसित हो गया कुछ उत्तरपंथी,कुछ दक्षिण पंथी तो कुछ वामपंथी विचारधारा के साथ पत्रकारिता करने लगे आजादी की लडाई मे पत्रकारों का अंग्रेजी हुकूमत ने ब्यापक नरसंहार भी किया क्योंकि देश मे क्रांतिकारी और देशभक्त आंदोलन करते उसकी खबरों को पत्रकार जंगलों मे अंग्रेजी हुकूमत से छिपकर अखबार निकालते फिर उसे भारतीय जनता मे प्रसार करते जिससे जनजागरण फैलता था अंग्रेजों ने इसे भाँप लिया और सुनियोजित तरीकों से जंगलों मे ही देश के आजादी के लिए काम कर रहे पत्रकारों जिसमे मालिकान, सम्पादक और पत्रकार शामिल थे उनकी नृसंसता पुर्ण हत्या कर गुमनामी की चादरों मे समेट दिया देश आजाद हुआ संविधान सभा बनी लेकिन संविधान सभा ने इस तथ्य को जानते हुए भी पत्रकारों को गुमनाम ही रहने दिया पत्रकारों को कोई भी सुरक्षा,सुविधा नही दिया बेवकूफ बनाने के लिये तत्कालीन संविधान सभा ने मालिकान, सम्पादक और पत्रकार मतलब यह तीनो पत्रकार की श्रेणी मे ही आते हैं इन्हे मौखिक चौथा स्तम्भ कह कर ब्याख्या कर दी इन्हे संविधान मे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह विधिक लिपिबद्ध स्तम्भ नही बनाया और यह भी कहा अगर पत्रकारों को सभी सुरक्षा, सुविधा और विधिक चौथा स्तंभ घोषित किया गया तो पत्रकार मजबूत हो जायेंगे और राजनेताओं को हर बार हर गलती पर सत्ता से उखाड़ फेकेंगे बेवकूफ बनाने के क्रम मे पत्रकार मे वर्णित मालिकान या सम्पादक को अखबारी कागज और स्याही को सरकारी ब्यवस्था से मुफ्त देने की ब्यवस्था कर दी और समाचार संस्थान अपने अन्य खर्चे के सरकारी विज्ञापन के जरिये पुरा करेंगे लेकिन उसका भी मुल्य निर्धारण अपने अधीन रखा तब से लेकर आज 72 सालों से भारत की पत्रकारिता जुझ रही है जबकि पत्रकार बिना पारिश्रमिक पाये पत्रकारिता करते हैं उनके आश्रित परिजन शिक्षा,स्वास्थ्य एवं अन्य सुविधाओं के अभाव मे दम तोड देते है उससे भी जी नही भरा तो सरकार ने पत्रकारों को तीन श्रेणियों मे उस तरह बाँट दिया जिस तरह राशनकार्ड बनाये जाते हैं अंत्योदय, वीपीएल और साधारण कार्ड मतलब एक सेलेब्रिटीज़ पत्रकार, दुसरा मान्यता प्राप्त और तीसरा बिना पैसे का काम करने वाला जिला व ग्रामीण स्तर पर पत्रकार। आजादी के महज 10 साल बाद ही पत्रकारों को अपनी गलती और अपने हितों की चिंता तब हुयी जब वे सत्य समाचार परोसने के बदले हत्या और उत्पीड़न के शिकार होने लगे सरकारी तंत्र उनकी कोई मदद नही करता किसी भी पत्रकार की नृसंस हत्या पर सरकार, मंत्री या राजनेता संवेदना ब्यक्त नही करता पत्रकारों के वेवा पत्नी व बच्चे निराश्रित होकर भटकने लगे तब उन्हे जरुरत हुयी संगठित होने की लेकिन तब तक देर हो चुकी देश की राजनैतिक दिशा बदल चुकी थी देश मे उत्तरपंथ सत्ता पर हावी था वामपंथ भारत के पूर्वोत्तर मे सत्ता पर हावी था जबकि दक्षिणपंथी सत्ता के लिए संघर्ष कर रहे थे इसलिए पत्रकारों के जो संगठन अस्तित्व मे आये उसमे वामपंथी व उत्तरपंथी पत्रकार संगठनों का उदय हुआ और इस तरह भारत मे अनेक पत्रकार संगठन बने लेकिन सभी अलग अलग विचारधारा के साथ काम करने लगे संगठनों के बनने के बाद भी सरकारी व्यवस्था का कोई भी लाभ इन्हे नही मिल सका सरकारी मशीनरी ने इनका कोई भी सहयोग नही किया सरकार ने कभी भी पत्रकारों का संज्ञान नही लिया और ना ही संविधान मे इन्हे लिपिबद्ध कर विधिक चौथा स्तम्भ बनाकर संविधान के तीनो अंगों के समान सुरक्षा एवं सुविधाओं से लैश ही किया आज भारत मे पत्रकार हत्या व उत्पीड़न के शिकार हैं और नही तो पहले से जुझ रहे पत्रकारों और समाचार संस्थाओं पर सरकारी कैंची चलाकर केवल इन्हे नियंत्रण करने के कानून पास किये जाते हैं विज्ञापन का रेट सरकार तय करेगी,विज्ञापन सभी समाचारपत्र मे अलग अलग मुल्य मे निर्धारित करेगी समाचारपत्र व समाचार एजेंसियों की अलग अलग रेटिंग करेगी पत्रकारों को सरकारी सुविधाएं नही देगी कोई मानदेय या भत्ता नही देगी बडे समाचार समूहों को लालीपाप देकर तोड डालेगी जबकि छोटे मझोले समाचारपत्र व समाचार एजेंसियों को बंद करने पर मजबूर कर देगी कुल मिलाकर आजादी के बाद से ही भारत की पत्रकारिता मृत्युशैया की तरह तेजी से पहुँच रही है जिसको रोकने के सारे उपाय व्यर्थ साबित हो रहे हैं भारत मे लगभग हजारों  के करीब पत्रकार संगठन बने हैं लेकिन सभी अलग अलग विचारधारा व गुट से ग्रसित हैं इसलिए सभी पत्रकार संगठन पत्रकारिता जगत से जुडे अपने हितों को सुरक्षित करने मे अपंग और असमर्थ हैं सर्वहितकारी पत्रकार महासंगठन का राष्ट्रीय स्तर पर संगठन बनाने के पूर्व इन सभी तथ्यों पर शोध किया गया जिनमे यह पाया गया कि जब तक भारत के सभी पत्रकार संगठन एक जगह एकत्र नही होंगें भारत के पत्रकारों, मालिकानो और सम्पादकों की हितों की रक्षा नही हो सकती पत्रकार भटकते रहेंगे हत्या उत्पीडन के साथ सरकार की घोर उदाशीनता के शिकार होते रहेंगे इन्हे एक नेतृत्व, एक महासंगठन और एक आवाज पर एक होकर केवल 24 घंटे के लिए कलम बंद करनी पडेगी,24 घंटे के लिए सभी समाचारपत्र संस्थान,सभी इलेक्ट्रॉनिक और पोर्टल न्यूज को बंद करना पडेगा तब जाकर सरकार की कुम्भकर्णी नीद टूटेगी और तब पत्रकारों को संविधान मे विधिक लिपिवद्धता के साथ चौथा स्तम्भ घोषित कर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की तरह सभी सरकारी सुविधाएं और सुरक्षा मिल सकेगी अन्यथा पत्रकार व समाचार संस्थान टूटते रहेंगे, विखरते रहेंगे और हत्या व उत्पीडन के शिकार होते रहेंगे। घनश्याम प्रसाद सागर राष्ट्रीय अध्यक्ष सर्वहितकारी पत्रकार महासंगठन आक्रोष4मीडिया भारत का नंबर 1 पोर्टल हैं जो की पत्रकारों व मीडिया जगत से सम्बंधित खबरें छापता है ! 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उतराखंड में विज्ञापनो की बंदरबाँट, मैगजीनों को विषेषांक के नाम पर लुटाये सवा करोड़ 

31-07-2019 11:55:41 पब्लिश - एडमिन

  • उतराखंड में विज्ञापनो की बंदरबाँट, मैगजीनों को विषेषांक के नाम पर लुटाये सवा करोड़ 

उतराखंड में विज्ञापनो की बंदरबाँट -दिल्ली,कर्नाटक,लखनऊ की मैगजीनों को विषेषांक के नाम पर लुटाये सवा करोड़  -प्रदेश के समाचार पत्रों को नियमो की दुहायी। देहरादून। उतराखंड प्रदेश में विज्ञापन विषेषांक के नाम पर बंदरबांट को लेकर एक खुलासा हुआ है। प...

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उत्तराखंड का लाल गणेश गोदियाल

29-07-2019 16:12:43 पब्लिश - एडमिन

उत्तराखंड कांग्रेस के 'संकटमोचक' साबित हो सकते हैं एक चेहरा जिस पर पूरी देव भूमि को भरोसा है.. एक युवा जिसमें नेतृत्व की क्षमता है.. एक नेता जो पहाड़वासियों के सपनों की संजीवनी है... गणेश गोदियाल सिर्फ और सिर्फ एक ऐसे नेता हैं जो प्रदेश के लोगों की उम्मीद हैं... उत्तराखंड के लोग उनको अपना तारणहार मानते हैं.. दरअसल इस वक्त कांग्रेस राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर बेहद ही बुरे दौर से गुजर रही है.. पार्टी को जरूरत है एक ऐसे संकटमोचक की जो मुश्किल दौर से कांग्रेस को बाहर निकाल सके.. वो संकटमोचक कोई और नहीं बल्कि गणेश गोदियाल साबित हो सकते हैं.. 2022 में उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव होने हैं और उससे ठीक पहले अगर पार्टी की कमान इस जोशीले नेता के कंधों पर आ जाए..तो पहाड़ फिर से कांग्रेस के हाथ आ सकता है.. ऐसा दावा इसलिए है क्योंकि गणेश गोदियाल को जब भी, जो भी जिम्मेदारी दी गई.. उन्होंने उसे बखूबी पूरा किया..हाल ही में श्रीनगर में नगरपालिका चुनाव की जिम्मेदारी उन्होंने अपने हाथों में ली और कांग्रेस को जीत का तोहफा दिया.. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि गणेश गोदियाल को यहां लोग अपने बेटे जैसा मानते हैं.. पहाड़ का ये लाल भी अपनी मीठी बोली से हर किसी को अपना कायल बना लेता है.. खैर, श्रीनगर में मिली जीत से हार के दौर से गुजर रही कांग्रेस को गणेश गोदियाल ने संजीवनी दे दी.. हताश कांग्रेस कार्यकर्ताओं में इस जीत से नई उर्जा का संचार हुआ.. एक मात्र ये ही उदाहरण नहीं है..जो राठ के लाल को बेहतरीन नेता साबित करता है.. ऐसी और भी कई मिसाल हैं.. बात 2002 की है, गणेश गोदियाल पहली बार थेलीशैण विधानसभा से चुनाव मैदान में उतरे.. ये सीट बीजेपी का गढ़ मानी जाती थी.. रमेश पोखरियाल निशंक कांग्रेस के शिवानंद नौटियाल को हारकर यहां से विधानसभा में गए थे.. बावजूद इसके गणेश गोदियाल ने इस सीट पर कब्जा किया और बीजेपी का किला ढहा दिया.. इसके बाद 2012 में भी जीत का परचम लहराया.. पार्टी के कद्दावर नेता होने के बावजूद गणेश गोदियाल में अहम नाम की चीज नहीं है.. वो लगातार अपने क्षेत्र में जाते हैं.. लोगों की दिक्कतों को सुनते हैं और उनको दूर करते हैं.. इस लोकसभा चुनाव में भी अगर कांग्रेस उनको पौड़ी सीट से टिकट देती तो निश्चित तौर पर गणेश गोदियाल अपनी सीट निकालने में कामयाब हो जाते.. ऐसा कुछ पत्रकारों के सर्वे में भी दावा किया जा रहा था.. लेकिन कांग्रेस ने यहां पर बड़ी गलती की.. पैराशूट उम्मीदवार मनीष खंडूरी पर गोदियाल से ज्यादा भरोसा जताया.. नतीजा सबके सामने है.. बावजूद इसके गणेश गोदियाल पार्टी की सेवा में निरंतर जुटे रहे.. 2015 की बात है जब हरीश रावत सरकार संकट में थी.. विजय बहुगुणा.. हरक सिंह रावत जैसे दिग्गज नेता पार्टी छोड़कर चले गए और सरकार गिराने की कोशिश हुई.. कई कांग्रेस विधायकों के ईमान डोले लेकिन गणेश गोदियाल टस से मस नहीं हुए वो हरीश रावत के साथ मजबूती से डटे रहे.. और सरकार पर आया संकट टल गया.. गणेश गोदियाल कई साल से लोगों की सेवा कर रहे हैं.. साथ ही उनकी संगठन में भी मजबूत पकड़ है.. इसलिए अब कांग्रेस के पास गणेश गोदियाल पर भरोसा करने का एक और मौका है.. ऐसा नहीं है कि प्रदेशवासी ही उनसे प्यार करते हैं.. बल्कि कांग्रेस के दिग्गज नेता हरीश रावत भी उनको कमान सौंपने की वकालत कर चुके हैं... साफ है अगर आलाकमान गणेश गदियाल पर भरोसा करता है तो राज्य में कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन हासिल कर सकती है |                                                                                                                                                                                                                                                          वरिष्ठ पत्रकार संजय गोदियाल आक्रोष4मीडिया भारत का नंबर 1 पोर्टल हैं जो की पत्रकारों व मीडिया जगत से सम्बंधित खबरें छापता है ! आक्रोष4मीडिया को सभी पत्रकार भाइयों की राय और सुझाव की जरूरत है ,सभी पत्रकार भाई शिकायत, अपनी राय ,सुझाव मीडिया जगत से जुड़ी सभी खबरें aakrosh4media2016@gmail.com व वव्हाट्सएप्प पर भेजें 9897606998... |संपर्क करें 9411111862 .खबरों के लिए हमारे फेसबुक आई.डी https://www.facebook.com/aakroshformedia/ पर ज़रूर देखें ...

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लीड है तो सजा होने पर कहां छापोगे भाइयों

27-07-2019 15:50:36 पब्लिश - एडमिन

आजम खान से माफी मांगने के लिए कहा जाएगा - लीड है तो सजा होने पर कहां छापोगे भाइयों? समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान के मामले में लोकसभा में जो हुआ उसकी रिपोर्टिंग अखबारों में दिलचस्प है। आज लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर (ज्यादातर में लीड के रूप में छपी) इस खबर का शीर्षक है, आजम खान माफी नहीं मांगेंगे तो कार्रवाई हो सकती है। दैनिक भास्कर ने आजम खान को बदजुबान–ए-आजम लिखा है तो नवभारत टाइम्स ने विवाद-ए-आजम। इसके अलावा कोई खास अंतर नहीं है। मेरा मुद्दा यह है कि माफी मांगने का विकल्प होने और नहीं मांगने पर सजा होने की खबर इतनी बड़ी नहीं है कि हिन्दी के लगभग सभी अखबारों में लीड बन जाए। सजा क्या हो सकती है इसपर अखबारों में कुछ खास नहीं है। सोमवार को आजम खान माफी मांग लें और सजा न हो तो अगले दिन (मंगलवार को) अखबार क्या करेंगे? आजम खान ने बिना शर्त माफी मांगी फिर लीड होगी? और अगर माफी नहीं मांगी – सजा हो गई तो लीड से ऊपर क्या करोगे? इस लिहाज से आज इस खबर को कम महत्व देने और सिंगल कॉलम में या अंदर के पन्ने पर छाप देने के आसान विकल्प के मुकाबले राजस्थान पत्रिका ने पूरे मामले को स्पष्ट करते हुए सात कॉलम में अच्छा डिसप्ले दिया है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है कि समाजवादी पार्टी पर माफी मांगने के लिए दबाव बढ़ गया है। टेलीग्राफ ने लिखा है आजम खान की आपत्तिजनक टिप्पणी को रिकार्ड से निकाल दिया गया है। साथ ही, यह भी लिखा है आजम खान ने कहा कि मैंने जो कहा उसमें एक भी शब्द असंसदीय हो तो मैं लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देता हूं। मेरे ख्याल से खबर यह नहीं है कि उनसे माफी मांगने के लिए कहा गया है। खबर यह है कि एक भी असंसदीय शब्द होने पर इस्तीफा देने की पेशकश के बावजूद ऐसी स्थितियां बन गई हैं कि उन्हें बिना शर्त माफी मांगनी होगी और नहीं मांगने पर लोकसभा अध्यक्ष को उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए अधिकृत कर दिया गया है। खबरों से यह पक्का नहीं हुआ कि आजम खान की टिप्पणी क्या थी और उसे रिकार्ड से निकाला गया कि नहीं। यह सही है कि आपत्तिजनक टिप्पणी को दोहराया नहीं जाना चाहिए पर वह असंसदीय नहीं है तो यह कैसे तय होगा कि अपमानजनक है। अखबारों और टेलीविजन से मैंने जो समझा है उसके मुताबिक आजम खान ने लोकसभा की पीठासीन अध्यक्ष रमा देवी से कुछ कहा जिसे उन्होंने आपत्तिजनक माना और माफी मांगने के लिए कहा। आजम खान ने सफाई में जो कहा उसे टेलीग्राफ ने छापा है पर किन परिस्थितियों और मनोदशा में क्यों कहा - यह सब छोड़ भी दिया जाए तो उसमें अगर कुछ अश्लील, असंसदीय या आपत्तिजनक है तो उसका फैसला सार्वनिजक रूप से नहीं होना चाहिए और टिप्पणी का उल्लेख किए बिना सिर्फ आपत्तिजनक कहना आजम खान के साथ अन्याय है। इस बारे में दैनिक हिन्दुस्तान ने लिखा है, कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी ने यह कहकर महिला सांसदों का गुस्सा बढ़ा दिया कि महिला के अपमान का समर्थन कोई नहीं करता लेकिन जिनके खिलाफ शिकायत की जा रही है, उनका पक्ष भी सुनना चाहिए। हालांकि बाद में उन्होंने स्पष्ट किया वे आजम की टिप्पणी का समर्थन नहीं करते। टेलीग्राफ के अनुसार, सामान्यतया इस मामले को संसद की एथिक्स कमेटी को भेज दिया जाना चाहिए था पर अभी तक इसका गठन नहीं हुआ है। कांग्रेस के अधीर रंजन चौधरी ने इस विवाद को सोनिया गांधी के बारे में भाजपा सदस्यों की पिछली टिप्पणियों के संदर्भ में पेश करने की कोशिश की पर सत्तापार्टी के नाराज सदस्यों खासकर महिला सांसदों के शोर में उनकी आवाज दब गई। वे आमराय से आजमखान की निन्दा की मांग कर रही थीं । .... हंगामे के आलोक में कांग्रेस सदस्यों ने हार मान ली। अखबार ने लिखा है कि आजम खान की टिप्पणी को रिकार्ड से हटा दिया गया लेकिन वीडियो क्लिप आम तौर पर उपलब्ध थे और मैं यह सुनिश्चित नहीं कर पाया कि विवाद उसी पर था या जो रिकार्ड से हटाया गया है वह कुछ और है। अखबार ने आगे लिखा है, गुरुवार को आजम खान ने यह कहकर उन्हें शांत करने की कोशिश की, आप मेरी बहन हैं , बहुत प्यारी बहन। मेरा लंबा राजनीतिक कैरियर रहा है, मेरे लिए यह संभव नहीं है कि मैं कुछ गलत बोलूं। (मैंने जो कहा है उसमें) अगर एक भी असंसदीय शब्द हो तो मैं संसद से अपने इस्तीफे की घोषणा करता हूं। ऐसे में यह समझना मुस्किल है कि विवाद किस बात पर है। अगर जो कहा गया वह असंसदीय नहीं है तो हटाया क्या गया और हटाया गया तो क्लिप क्या है और क्लिप में कुछ असंसदीय नहीं है तभी तो इस्तीफे की पेशकश या घोषणा की कोई चर्चा नहीं है। अगर इस्तीफे की पेशकश की चर्चा नहीं है तो सजा या कार्रवाई की खबर इतनी बड़ी क्यों बनाई गई है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह राजनीति है और प्रचारनीति का हिस्सा। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक और खबर के अनुसार सदस्यों ने आजम खान की टिप्पणी की निन्दा की, और भिन्न दलों ने उन्हें कार्रवाई के लिए अधिकृत किया। खबर का शीर्षक है, उन्हें चेतावनी दी जाएगी : माफी माफी मांगिए या कार्रवाई के लिए तैयार रहिए। शालिनी नायर की बाइलाइन वाली इस खबर की शुरुआत इस प्रकार होती है, शुक्रवार को भिन्न दलों के नेताओं की बैठक में (लोकसभा अध्यक्ष) ओम बिड़ला को अधिकृत किया गया कि आजम खान सदन में माफी नहीं मांगते हैं तो उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए। अखबार ने लिखा है कि इससे समाजवादी पार्टी पर पर बिना शर्त माफी मांगने का दबाव बढ़ गया है। अखबार के मुताबिक, संसदीय मामलों के मंत्री प्रल्हाद जोशी ने हैठक के बाद कहा, (लोकसभा) अध्यक्ष उनसे रमा देवी के खिलाफ की गई टिप्पणी के लिए बिनाशर्त माफी मांगने के लिए कहेंगे। अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो अध्यक्ष को उनके खिलाफ कार्रवाई के लिए अधिकृत किया गया है। टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर इसी आशय की छोटी सी खबर है। अंदर के पन्ने पर पूरा घटनाक्रम विस्तार से दिया गया है। हिन्दुस्तान टाइम्स में भी सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक लगभग यही है। साफ है कि आजम खान को जबरदस्ती घेरा गया है। संसद के शोर में दूसरे सदस्यों को भले बोलने नहीं दिया गया पर अखबारों को लिखने से कौन रोक रहा है। दिलचस्प यह है कि महिलाओं से अभद्रता को मुद्दा भारतीय जनता पार्टी बना रही है जिसका अपना रिकार्ड इस मामले में सबसे बुरा है। अखबार पूरी जानकारी देने की बजाय सरकारी पक्ष को हवा दे रहे हैं। आप जानते हैं कि भाजपा के एक विधायक बलात्कार के आरोप में जेल में हैं और जेल भी वे कब और कैसे गए। भाजपा के ही एक नेता ने मायावती के खिलाफ अबद्र टिप्पणी की थी तब पार्टी ने क्या और कैसी कार्रवाई की थी उसे लगता है लोग भूल गए। कार्रवाई तो बल्लामार विधायक के खिलाफ भी नहीं हुई है जबकि अखबार छाप चुके हैं कि प्रधानमंत्री ने ऐसे कहा है इसलिए कार्रवाई होगी। आजम खान और रमा देवी से संबंधित विवाद के संबंध में दैनिक भास्कर ने लिखा है, रमा देवी ने कहा कि आजम हीरो बनने आए हैं, लेकिन मैं उन्हें जीरो बनाकर ही दम लूंगी। क्या यह अपमानजनक नहीं है? क्या इसके बाद माफी मांगने की गुंजाइश बचती है? दैनिक भास्कर ने ही छापा है कि असदुद्दीन ओवैसी ने संसद में कहा कि आजम खान पर कार्रवाई जरूरी है लेकिन मीटू मामे में एमजे अकबर पर रिपोर्ट कहां है। हिन्दुस्तान ने इस खबर को लीड बनाया है और इसके लिए अपना शीर्षक सुधार लिया है। गुस्सा स्लग के तहत अखबार का फ्लैग शीर्षक है, लोकसभा सांसद पर अमर्यादित टिप्पणी से नाराज, सख्त कार्रवाई की मांग। मुख्य शीर्षक है, महिला सांसदों ने एक सुर में आजम को धिक्कारा। किसी खबर को लीड बनाने के लिए अगर आप राजस्थान पत्रिका की तरह विस्तार नहीं देते तो भी कम से कम शीर्षक लीड जैसा होना चाहिए। आजम खान को बदजुबान या विवाद ए जुबान कहने से खबर बड़ी नहीं हो जाएगी। वैसे भी, आजम खान के एक बयान को पहले भी बिना संदर्भ के या अलग संदर्भ में उछाल कर उन्हें घेरा जा चुका है। देश में कौन नहीं जानता है कि कोई खाकी चड्ढी पहनता है कहने का मतलब यह नहीं है कि उसकी डोरा, रुपा, जॉकी या वीआईपी की चड्ढी का रंग खाकी है। आजम खान की पत्नी ने सही कहा है कि चुनाव के समय आजम खान को ऐसे मामलों में लपेटना आम बात है। अमर उजाला और दैनिक जागरण में भी यह खबर लीड है अमर उजाला का शीर्षक है, आजम माफी मांगें, नहीं तो कार्रवाई। मैंने जितने अखबार देखे उनमें सिर्फ अमर उजाला ने आजम खान की पत्नी तंजीम फातिमा, राज्य सभा सदस्य की प्रतिक्रिया को प्रमुखता से छापा है। यही नहीं अखबार ने इस बात को भी प्रमुखता से छापा है कि आजम खान का भी पक्ष सुना जाए। पर उसका क्या हुआ वह मैं पहले लिख चुका हूं। दैनिक जागरण में शीर्षक है, आजम पर लटकी निलंबन की तलवार। उपशीर्षक है, सख्त रुख - सदन में सार्वजनिक रूप से माफी नहीं मांगी तो कार्ववाई निश्चित। इंट्रो है, आजम (खान) से सोमवार को स्पीकर के सामने पेश होकर मांफी मांगने को कहा गया है। तीनों से यह पता नहीं चलता है कि मामला क्या है और क्यों माफी मांगने के लिए कहा गया है या क्यों तलवार लटकी है। दैनिक जागरण में मुख्य खबर के साथ केंद्रीय मंत्री, स्मृति ईरानी की फोटो और उनका बयान है, समाजवादी पार्टी के सांसद का बयान पुरुषों समेत सदन के सभी सदस्यों पर एक धब्बा है। अगर आजम खां ने यह टिप्पणी संसद के बाहर की होती तो महिला के बचाव में पुलिस आ गई होती। बिना टिप्पणी जाने इस बयान पर क्या कहा जाए और पिछली बार ऐसे ही बयान पर (वो तो सार्वजनिक है क्योंकि संसद में नहीं था) पुलिस की कार्रवाई हुई थी – ऐसा मेरी जानकारी में नहीं है। नवोदय टाइम्स ने इस खबर को टॉप पर दो कॉलम में दो लाइन के शीर्षक और आजम खान तथा रमा देवी की फोटो के साथ छापा है। तथ्य कम हैं और पूरी जगह शीर्षक, फोटो और इंट्रो ने ले ली है। हालांकि, इंट्रो महत्वपूर्ण है, विशेषाधिकार हनन प्रस्ताव पास हुआ तो जा सकती है सदस्यता। इस बारे में दूसरे अखबार की राय अलग है। हालांकि, अखबारों ने सजा को इतना महत्व दिया है तो सजा क्या हो सकती है इसपर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए थी। पर ज्यादातर अखबार इस मुद्दे पर शांत हैं। पता नहीं वास्तविक स्थिति क्या है पर बहुमत का खेल तो दिलचस्प चल रहा है, देखते रहिए, पढ़ते रहिए। मैं यही नहीं जानता कि टिप्पणी क्या थी। इसके बावजूद अगर जिससे कहा उन्हें बुरा लगा तो यह उनका हक है और उसपर प्रतिक्रिया का अंदाज उनका अपना है, होगा। लेकिन सार्वजनिक चर्चा हो तो पूरी तरह या न हो। एक पक्षीय नहीं। अखबारों को इसका ख्याल रखना चाहिए।                                                                                                                                                                                                                                                                पत्रकार संजय कुमार सिंह आक्रोष4मीडिया भारत का नंबर 1 पोर्टल हैं जो की पत्रकारों व मीडिया जगत से सम्बंधित खबरें छापता है ! आक्रोष4मीडिया को सभी पत्रकार भाइयों की राय और सुझाव की जरूरत है ,सभी पत्रकार भाई शिकायत, अपनी राय ,सुझाव मीडिया जगत से जुड़ी सभी खबरें aakrosh4media2016@gmail.com व वव्हाट्सएप्प पर भेजें 9897606998... |संपर्क करें 9411111862 .खबरों के लिए हमारे फेसबुक आई.डी https://www.facebook.com/aakroshformedia/ पर ज़रूर देखें ...

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